लोकतंत्र बनाम न्यायपालिका- क्या अदालतें राष्ट्रपति पर हावी हो सकती हैं

  • अदालत बनाम संविधान के सर्वोच्च पद – किसकी चलेगी?

  • राष्ट्रपति को निर्देश देने का अधिकार – कितना जायज़, कितना विवादित?

  • अनुच्छेद 142 पर बहस: सुप्रीम कोर्ट की शक्ति या सीमा?

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा तय करने के फैसले पर देश के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि अदालतें राष्ट्रपति को निर्देश नहीं दे सकतीं और इस प्रकार की स्थिति लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। धनखड़ ने कहा, “हम ऐसे हालात नहीं बना सकते जहां अदालतें राष्ट्रपति को निर्देश दें। संविधान का अनुच्छेद 142 अब 24×7 उपलब्ध न्यूक्लियर मिसाइल बन गया है, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बन सकता है।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार सर्वोपरि है और सभी संवैधानिक संस्थाओं को अपनी सीमाओं में रहकर काम करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल के मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए राज्यपाल और राष्ट्रपति दोनों को समयबद्ध फैसले लेने की जिम्मेदारी तय की थी। 11 अप्रैल को सार्वजनिक किए गए विस्तृत आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति के पास पूर्ण वीटो या पॉकेट वीटो का अधिकार नहीं है और उनके फैसले की भी न्यायिक समीक्षा हो सकती है।

राज्यपालों के लिए भी तय की गई समय-सीमा

तमिलनाडु मामले में कोर्ट ने राज्यपालों के अधिकारों की भी सीमाएं तय कीं। अदालत ने कहा कि राज्यपाल के पास किसी भी बिल को रोकने की वीटो पावर नहीं है और उन्हें विधानसभा से पास बिल पर एक महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल आरएन रवि द्वारा 10 जरूरी बिलों को रोके जाने को “मनमाना” और “गैर-कानूनी” बताया। अदालत ने कहा कि राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह का पालन करना चाहिए था।

कपिल सिब्बल ने फैसले को बताया ऐतिहासिक

पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और कहा कि अब केंद्र सरकार राज्यों के बिलों पर जानबूझकर निर्णय में देरी नहीं कर पाएगी। उन्होंने कहा कि अदालत का यह निर्णय संघीय ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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