
हेग। दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन NATO की समिट आज द हेग में शुरू हो गई। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब रूस-यूक्रेन युद्ध जारी है, मिडिल ईस्ट में ईरान-इजराइल संघर्ष भड़क चुका है और वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर हालात में है। 76 साल पुराना यह संगठन आज अपनी सबसे बड़ी चुनौतियों से जूझ रहा है।
ट्रम्प के बयानों से हिला गठबंधन
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने हाल के वर्षों में NATO को लगातार कठघरे में खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि अगर NATO देश अपनी GDP का 2% रक्षा खर्च पर नहीं लगाते तो अमेरिका उनके लिए कोई सैन्य मदद नहीं करेगा। ट्रम्प ने यहां तक कहा कि वह ऐसे देशों पर रूस के हमले को बढ़ावा देंगे।
क्या है NATO और क्यों बना था?
NATO (North Atlantic Treaty Organization) की स्थापना 4 अप्रैल 1949 को 12 देशों के सैन्य गठबंधन के रूप में हुई थी। यह USSR (अब रूस) की विस्तारवादी नीतियों के जवाब में बना। इसका मकसद था – किसी भी सदस्य देश पर हमला होने पर सभी मिलकर उसकी रक्षा करें (आर्टिकल 5)।
फ्रांस और ग्रीस जैसे सदस्य भी कर चुके हैं बगावत
1966 में फ्रांस ने अमेरिका और ब्रिटेन के दबदबे के खिलाफ सैन्य कमान से खुद को अलग कर लिया था। बाद में 2009 में वह फिर से पूरी तरह NATO में शामिल हो गया।
ग्रीस ने 1974 में तुर्की के साइप्रस पर हमले के बाद नाराज होकर सैन्य सहयोग खत्म किया था। हालांकि अमेरिका की मध्यस्थता से 1980 में वह लौट आया।
तुर्की और अमेरिका के रिश्ते भी तनाव में
सीरिया में कुर्द लड़ाकों को अमेरिका का समर्थन, तुर्की के रूस से S-400 मिसाइल खरीदने, और F-35 फाइटर जेट प्रोग्राम से बाहर होने जैसे मुद्दों ने तुर्की-अमेरिका संबंधों को प्रभावित किया है।
हंगरी और ट्रम्प की नीतियों से NATO में फूट
हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन पर लोकतंत्र और प्रेस की आजादी दबाने के आरोप हैं। हंगरी कई बार रूस-समर्थक रवैया दिखा चुका है और यूक्रेन संबंधी प्रस्तावों को वीटो किया है।
अमेरिका के भरोसे खड़ा यूरोप
WWII के बाद अमेरिका बना सुपरपावर
अमेरिका ने परमाणु सुरक्षा की गारंटी दी, जिससे यूरोप को अपने हथियार नहीं बनाने पड़े
जर्मनी, पोलैंड, ब्रिटेन में अमेरिकी मिलिट्री बेस और सैनिक तैनात हैं
यूरोपीय देश रक्षा पर अमेरिका से बहुत कम खर्च करते हैं
अगर अमेरिका NATO से अलग हुआ तो…?
यूरोपीय देशों को अपने रक्षा बजट में 2% से बढ़ाकर 3% तक खर्च करना पड़ेगा
गोला-बारूद, कमांड सिस्टम, सैटेलाइट, ड्रोन, फ्यूलिंग प्लेन की भारी कमी
अमेरिका के बिना न्यूक्लियर पॉलिसी भी कमजोर पड़ेगी
अमेरिका के पास जहां हजारों परमाणु हथियार हैं, वहीं UK और फ्रांस मिलाकर सिर्फ 500 हैं
रूस के पास 6000 से ज्यादा न्यूक्लियर हथियार हैं
NATO का भविष्य क्या?
इस समिट में नेताओं के सामने कई कठिन सवाल हैं:
क्या NATO अमेरिकी नेतृत्व के बिना जीवित रह सकता है?
क्या यूरोप अपनी रक्षा-नीति में आत्मनिर्भर बन पाएगा?
रूस और चीन के बढ़ते खतरे के बीच NATO की एकजुटता कितनी टिकाऊ है?








