बाजार के दामों ने गेहूं खरीद को क्यों बनाया चुनौतीपूर्ण

  • सरकारी खरीद की धीमी चाल ने बढ़ाई चिंता
  • किसानों ने बाजार को चुना, सरकारी केंद्र रह गए पीछे
  • ऊंचे बाजार भाव ने बदली किसानों की प्राथमिकता

अम्बेडकरनगर। कृषि प्रधान जिले में इस साल गेहूं की सरकारी खरीद धीमी रफ्तार से चल रही है। 17 मार्च से शुरू हुई खरीद प्रक्रिया के 27 दिन बाद भी 88 क्रय केंद्रों पर केवल 20,000 क्विंटल गेहूं ही खरीदा जा सका है। यह आंकड़ा किसानों की बदलती रणनीति और बाजार के रुझान को दर्शाता है।

सरकारी और बाजारी भाव में बड़ा अंतर

खरीद में सुस्ती का प्रमुख कारण सरकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और बाजार भाव के बीच का अंतर है। जहां सरकारी केंद्रों पर गेहूं का भाव ₹2,425 प्रति क्विंटल है, वहीं व्यापारी ₹2,700 प्रति क्विंटल तक दे रहे हैं। इस वजह से किसान सरकारी केंद्रों की बजाय सीधे व्यापारियों को अपना गेहूं बेचना पसंद कर रहे हैं।

क्रय केंद्रों पर किसानों की कम रुचि

खरीद प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी क्रय केंद्रों पर किसानों की उपस्थिति नगण्य रही। 1 अप्रैल तक तो कोई भी किसान केंद्रों पर नहीं पहुंचा। 2 अप्रैल से सिझौली मंडी में कुछ हलचल शुरू हुई, लेकिन अभी भी खरीद की रफ्तार धीमी है।

व्यापारियों की सक्रियता, सरकारी प्रयास कमजोर

विपणन विभाग के अनुसार, अब गांवों में ही व्यापारी मड़ाई के समय गेहूं खरीद रहे हैं। किसानों को तुरंत बेहतर भाव मिलने से वे सरकारी केंद्रों की ओर रुख नहीं कर रहे। इससे सरकारी खरीद योजना प्रभावित हो रही है।

प्रशासन की नई रणनीति

इस चुनौती से निपटने के लिए प्रशासन और विपणन विभाग ने कदम बढ़ाए हैं:

  • गांव-गांव जाकर किसानों को क्रय केंद्रों तक लाने का प्रयास।
  • कुछ क्षेत्रों में टीमें घर-घर जाकर गेहूं खरीद रही हैं।
  • जिले का गेहूं बाहर न जाए, इसके लिए निगरानी बढ़ाई गई है।

लक्ष्य हासिल करने की चुनौती

डिप्टी आरएमओ संतोष द्विवेदी के मुताबिक, सरकारी लक्ष्य पूरा करने के लिए पूरा प्रयास किया जा रहा है, लेकिन बाजार और सरकारी भाव के अंतर को पाटे बिना खरीद को गति देना मुश्किल होगा।

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