350 साल पुराना ‘मोटे शाबान का ताजिया’ बारादरी इमामबाड़े से निकला

  • दोषीपुरा स्थित बारादरी मस्जिद से निकला 350 साल पुराना ताजिया
  • 1981 से हर साल 6 मोहर्रम को पुलिस की मौजूदगी में होता है बाहर
  • 8 तालों की सील में सालभर मस्जिद के हुजरे में रहता है बंद

वाराणसी। मोहर्रम के पवित्र अवसर पर वाराणसी के दोषीपुरा स्थित बारादरी इमामबाड़े में 350 साल पुराना मोटे शाबान का ताजिया मंगलवार को पूरे सम्मान और पारंपरिक रस्मों के साथ बाहर निकाला गया। यह ताजिया सालभर मस्जिद के विशेष 10×10 फीट के हुजरे में 8 तालों की सील में बंद रहता है और हर साल 6 मोहर्रम को पुलिस की मौजूदगी में सील तोड़कर बाहर निकाला जाता है।

1981 से जारी परंपरा के अनुसार, सुबह 10 बजे एसओ जैतपुरा बृजेश मिश्रा और मुतवल्ली गुलजार अली की मौजूदगी में सभी ताले खोले गए। ताजिए को 42 अलग-अलग हिस्सों में रखकर संरक्षित किया गया था, जिन्हें एक-एक करके बाहर निकाला गया।

ताजिए की हुई सफाई और सजावट

ताजिए को शाम तक बारादरी में पूरी तरह से स्थापित कर दिया जाएगा। अंजुमन के लोग इसकी सफाई और सजावट में जुटे हैं। यह ताजिया साखू, शीशम और सागवान की लकड़ी से बना है तथा उस पर ईरानी नक्काशी, चांदी और सोने के पत्तर का उपयोग किया गया है। इसे ईरानी और मुग़ल शैली में डिजाइन किया गया है।

10 मोहर्रम को उठाया जाएगा ताजिया

गुलजार अली ने बताया कि यह ताजिया 10 मोहर्रम की सुबह 60 लोगों द्वारा उठाकर सदर इमामबाड़ा, लाट सरैया ले जाया जाएगा। इसके बाद ताजिया वापस बारादरी लाया जाएगा और 12 मोहर्रम की शाम को पुनः उसी सील में बंद किया जाएगा।

मोटे शाबान से जुड़ा है ताजिए का इतिहास

गुलजार अली ने बताया कि यह ताजिया 1857 से पहले से ही मौजूद है, और यह उनके पूर्वज मोटे शाबान से जुड़ा है, जो तत्कालीन काशी नरेश के करीबी थे। उनके सम्मान में यह ताजिया ‘मोटे शाबान का ताजिया’ नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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