
लंदन। ब्रिटेन की वित्त मंत्री रेचल रीव्ज सत्र के दौरान भावुक होकर रो पड़ीं। यह घटना तब हुई जब प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर विपक्ष के तीखे सवालों का जवाब दे रहे थे। संसद की कार्यवाही के दौरान उनके आंसू कैमरे में कैद हो गए और सोशल मीडिया पर वीडियो तेजी से वायरल हो गया।
इस भावुक क्षण ने न केवल राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि इसका असर आर्थिक मोर्चे पर भी देखा गया। पाउंड की कीमत अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 1% तक गिर गई, जो अक्टूबर 2022 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट थी। तब लिज ट्रस के मिनी-बजट से बाजार में भारी उथल-पुथल मच गई थी।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और प्रधानमंत्री का बचाव
वित्त मंत्री के आंसुओं को लेकर कई नेताओं और आम लोगों ने आलोचना की। कुछ ने इसे कमजोरी का संकेत बताया। हालांकि प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने रीव्ज का समर्थन करते हुए कहा,
“उनके आंसू किसी राजनीतिक फैसले से नहीं, बल्कि निजी कारणों से थे।”
उन्होंने यह भरोसा भी दिलाया कि रीव्ज आने वाले कई वर्षों तक चांसलर बनी रहेंगी।
रीव्ज के रोने की संभावित वजहें
वित्त मंत्री के आंसुओं की असल वजह का खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में कई अटकलें लगाई जा रही हैं—
कुछ का मानना है कि विपक्ष के तीखे सवालों से वो भावुक हो गईं।
कुछ सूत्रों ने बताया कि लेबर सांसदों के साथ विवाद और कल्याणकारी योजनाओं में कटौती के प्रस्ताव ने उन्हें मानसिक रूप से प्रभावित किया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, संसद सत्र से ठीक पहले पीएम स्टार्मर और रीव्ज के बीच तीखी बहस हुई थी, जिससे वे असहज हो गई थीं। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन खबरों को खारिज किया गया है।
सरकार का यू-टर्न और विपक्ष का हमला
चांसलर रीव्ज ने विकलांग और बेरोजगारों को मिलने वाली कुछ सुविधाओं में कटौती का प्रस्ताव दिया था, जिसका लेबर पार्टी के कई सांसदों ने विरोध किया। भारी दबाव के बाद सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा। लेकिन इससे सरकार को 5 बिलियन पाउंड प्रति वर्ष का घाटा होगा, जिसे पूरा करने के लिए अब टैक्स बढ़ाने की संभावना जताई जा रही है।
विपक्षी नेता केमी बैडेनोच ने तीखा हमला बोलते हुए कहा,
“रीव्ज अब चांसलर की भूमिका में नहीं दिखतीं। संभव है कि वे अगले चुनाव तक पद पर न रहें।”
आर्थिक असर
रीव्ज के रोने और सरकार के फैसलों में अस्थिरता के कारण बाजार में भी हलचल मच गई।
पाउंड की गिरावट से निवेशकों में चिंता बढ़ी।
आर्थिक विश्लेषकों ने इसे नीतिगत अनिश्चितता और राजनीतिक कमजोरी का संकेत बताया।








