
- भारत ने धार्मिक मामलों पर निष्पक्ष रुख दोहराया
- दलाई लामा ने गादेन फोडंग ट्रस्ट को सौंपी उत्तराधिकारी चयन की जिम्मेदारी
- चीन ने उठाया विरोध, तिब्बती समुदाय ने किया खारिज
नई दिल्ली। दलाई लामा के उत्तराधिकारी को लेकर तिब्बती समुदाय और चीन के बीच छिड़े विवाद के बीच भारत सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह आस्था और धर्म से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप नहीं करती। शुक्रवार को विदेश मंत्रालय (MEA) ने बयान जारी कर कहा कि भारत ने हमेशा सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया है और आगे भी देता रहेगा।
विदेश मंत्रालय का यह बयान 2 जुलाई को धर्मशाला में आयोजित 15वें तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में दलाई लामा द्वारा दिए गए उस बयान के बाद आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके उत्तराधिकारी को चुनने का अधिकार सिर्फ तिब्बती बौद्धों के पास है और इसमें किसी अन्य देश या संस्था का कोई दखल नहीं होगा। दलाई लामा ने यह स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी गादेन फोडंग ट्रस्ट को सौंपी गई है, जिसकी स्थापना उन्होंने 2015 में की थी।
चीन ने जताई आपत्ति, भारत ने रखा तटस्थ रुख
दलाई लामा के बयान पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उत्तराधिकारी की नियुक्ति चीन के कानूनों, परंपराओं और ‘गोल्डन अर्न प्रक्रिया’ के तहत होगी। चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने दलाई लामा के हालिया वीडियो बयान और उनकी पुस्तक “वॉयस फॉर द डायसलेस” में लिखी बातों को खारिज किया।
चीन का दावा है कि 1793 में शुरू हुई ‘गोल्डन अर्न प्रक्रिया’ के तहत दलाई लामा की नियुक्ति का अंतिम अधिकार केवल चीन सरकार के पास है। इस पर तिब्बती समुदाय ने जवाब दिया कि यह प्रक्रिया केवल 11वें और 12वें दलाई लामा तक सीमित रही थी। 9वें, 13वें और 14वें दलाई लामा की नियुक्ति इसमें शामिल नहीं थी।
CTA ने लगाया चीन पर राजनीति करने का आरोप
धर्मशाला में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सेंट्रल तिब्बतियन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) के प्रमुख पेन्पा शेरिंग ने चीन पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि “चीन दलाई लामा के उत्तराधिकार को राजनीतिक हथियार बना रहा है। यह पूरी तरह से एक आध्यात्मिक परंपरा है, जिसे कोई सरकार तय नहीं कर सकती।”
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि शी जिनपिंग की सरकार तिब्बती धर्म, संस्कृति, भाषा और पहचान को systematically खत्म करने का प्रयास कर रही है।
आगामी निर्णय की पृष्ठभूमि तैयार
दलाई लामा, जो 6 जुलाई को 90 वर्ष के होने वाले हैं, पहले ही कह चुके हैं कि वे 90 वर्ष की आयु के आसपास अपने उत्तराधिकारी को लेकर निर्णय लेंगे। 24 सितंबर 2011 को भी उन्होंने इसी बात को दोहराया था।
उन्होंने यह भी साफ किया है कि उनका पुनर्जन्म चीन के बाहर, एक स्वतंत्र क्षेत्र में होगा – ताकि तिब्बती बौद्ध धर्म की स्वतंत्रता बनी रहे और उनके कार्यों की निरंतरता कायम रहे।
सम्मेलन में वैश्विक भागीदारी
तीन दिवसीय तिब्बती धार्मिक सम्मेलन में दुनिया भर से तिब्बती प्रतिनिधि, सिविल सोसाइटी के सदस्य, संसद सदस्य और बौद्ध परंपराओं के प्रमुख लामाओं ने हिस्सा लिया। सम्मेलन का उद्देश्य तिब्बती धार्मिक स्वतंत्रता और उत्तराधिकारी चयन की पारंपरिक प्रक्रिया को पुनः स्थापित करना है।








