क्या होगा अगर सीएचसी के अधीक्षक और राज्य सरकार ने जवाब नहीं दिया?

  • पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर: एक नई कानूनी जंग का आगाज
  • लखनऊ हाईकोर्ट में स्वास्थ्य केंद्र विवाद का नया मोड़
  • हाईकोर्ट का अहम आदेश: पत्रकारों की गिरफ्तारी पर तत्काल रोक

अम्बेडकरनगर। नगपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में घायल मरीज के इलाज में लापरवाही और पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार के मामले ने नया मोड़ ले लिया है। उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने पत्रकारों की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए स्वास्थ्य केंद्र के अधीक्षक डॉ. जयप्रकाश और उत्तर प्रदेश सरकार को चार सप्ताह में जवाब मांगा है।

क्या है पूरा मामला?

मामला अम्बेडकरनगर के नगपुर सीएचसी का है, जहां एक सड़क हादसे में घायल व्यक्ति को इलाज के लिए लाया गया था। परिजनों ने इलाज में लापरवाही का आरोप लगाया, जिसके बाद पत्रकारों ने जानकारी लेने का प्रयास किया। आरोप है कि डॉ. दानिश ने पत्रकारों के साथ अभद्र व्यवहार किया और उनके खिलाफ वीडियो बनाकर कोतवाली में एफआईआर दर्ज करा दी। बाद में सीएचसी अधीक्षक डॉ. जयप्रकाश स्वयं थाने पहुंचे और पत्रकारों की गिरफ्तारी का दबाव बनाने लगे।

हाईकोर्ट ने दिया अंतरिम राहत

इस कार्रवाई के खिलाफ पत्रकार प्रेम सागर विश्वकर्मा और अन्य ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका (अपराध विविध रिट संख्या 3606/2025) दायर की। याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट ज्योति त्रिपाठी और एडवोकेट विशाल त्रिपाठी ने दलील दी कि पत्रकारों पर लगे आरोप ऐसे नहीं हैं, जिनमें बिना जांच गिरफ्तारी की जाए।

कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने कहा कि चूंकि आरोपों में अधिकतम सजा सात साल से कम है, इसलिए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023 की धारा 35(3) और सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) के दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी से पहले इन प्रावधानों का सख्ती से पालन किया जाए।

अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद

कोर्ट ने डॉ. जयप्रकाश और यूपी सरकार को चार हफ्ते में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है और मामले को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर लिया है। साथ ही, अदालत ने कहा कि इस बीच गिरफ्तारी से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का पूरी तरह पालन किया जाए।

मामले की मुख्य बिंदु:

  • पत्रकारों ने सीएचसी में मरीज के इलाज में लापरवाही की खबर बनाई।
  • डॉक्टरों ने पत्रकारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई और गिरफ्तारी का दबाव बनाया।
  • हाईकोर्ट ने गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया।
  • अदालत ने कहा, “7 साल से कम सजा वाले मामलों में गिरफ्तारी से पहले जांच जरूरी।”
  • अब मामले में अगली सुनवाई का इंतजार है, जिसमें डॉक्टर और प्रशासन की ओर से जवाब दाखिल किया जाना है।
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