
- मिशन स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल से फ्लोरिडा से लॉन्च होगा
- एक्सिओम स्पेस और नासा का चौथा प्राइवेट स्पेस मिशन
- ISS पृथ्वी की परिक्रमा 90 मिनट में पूरी करता है
नई दिल्ली। इंडियन एस्ट्रोनॉट शुभांशु शुक्ला एक्सिओम मिशन 4 के तहत 10 जून 2025 को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) जाएंगे। रविवार को उन्होंने फुल ड्रेस फाइनल रिहर्सल पूरी की, जिसमें असेंबली बिल्डिंग से रॉकेट तक जाने और कैप्सूल में बैठने का अभ्यास शामिल था। शुभांशु ने इस अनुभव को “बेहतरीन यात्रा” बताया और कहा कि वह खुद को सौभाग्यशाली महसूस कर रहे हैं।
एक्सिओम मिशन 4 में चार देशों के चार एस्ट्रोनॉट
इस मिशन में भारत, पोलैंड, हंगरी और अमेरिका के चार एस्ट्रोनॉट 14 दिन के लिए ISS पर जाएंगे। मिशन शाम 5:54 बजे फ्लोरिडा के नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर से फाल्कन-9 रॉकेट के जरिए लॉन्च होगा। शुभांशु ISS पर जाने वाले दूसरे भारतीय हैं, इससे पहले राकेश शर्मा ने 1984 में सोवियत स्पेसक्राफ्ट से अंतरिक्ष यात्रा की थी।
मिशन में शामिल अन्य एस्ट्रोनॉट्स की जानकारी
पोलैंड के स्लावोज़ उज़्नान्स्की और हंगरी के टिबोर कापू इस मिशन में शामिल हैं। दोनों अपने-अपने देशों के दूसरे अंतरिक्ष यात्री होंगे। अमेरिकी पैगी व्हिटसन का यह दूसरा कॉमर्शियल स्पेस फ्लाइट मिशन है।
शुभांशु शुक्ला का परिचय और अनुभव
शुभांशु शुक्ला लखनऊ के रहने वाले हैं। उन्होंने सिटी मॉन्टेसरी स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) से ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की। भारतीय वायुसेना में 2006 से सेवा दे रहे शुभांशु अनुभवी फाइटर और टेस्ट पायलट हैं, जिनके पास 2,000 घंटे से अधिक का उड़ान अनुभव है। वे सुखोई-30 MKI, मिग-21, मिग-29 समेत कई लड़ाकू विमान उड़ा चुके हैं।
मिशन की तकनीकी जानकारी
चारों एस्ट्रोनॉट्स स्पेसएक्स के ड्रैगन कैप्सूल में उड़ान भरेंगे। यह मिशन फाल्कन-9 रॉकेट से नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर से लॉन्च किया जाएगा। लॉन्च की तारीख मिशन तैयारियों और फाइनल अप्रूवल के बाद तय की जाएगी।
एक्सिओम स्पेस और नासा के सहयोग से हो रहा मिशन
यह मिशन अमेरिका की प्राइवेट कंपनी एक्सिओम स्पेस और नासा के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। एक्सिओम स्पेस का यह चौथा मिशन है, जिसके पहले तीन मिशन सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं।
इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन की जानकारी
ISS पृथ्वी के चारों ओर 28,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूमता है और लगभग हर 90 मिनट में पृथ्वी की परिक्रमा पूरी करता है। यह पांच प्रमुख स्पेस एजेंसियों के सहयोग से बनाया गया है और अंतरिक्ष में माइक्रोग्रैविटी की स्थिति में वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए इस्तेमाल होता है। इसका पहला हिस्सा नवंबर 1998 में लॉन्च किया गया था।








