- स्नान पूर्णिमा पर हुआ विशेष स्नान
- औषधीय जल से किया गया स्नान
- भगवान हुए अस्वस्थ, शुरू हुआ एकांतवास
नई दिल्ली। भगवान जगन्नाथ की भव्य स्नान यात्रा आज 11 जून को श्रद्धा व परंपरा के साथ सम्पन्न हुई। स्नान पूर्णिमा के इस पावन अवसर पर भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा ने श्रीमंदिर परिसर में विशेष अनुष्ठान के तहत महास्नान किया। अब वे 15 दिनों के एकांतवास यानी अनवसर में रहेंगे और 27 जून को पुनः रथ यात्रा के लिए तैयार होंगे।
सोने के 108 कलशों से हुआ स्नान
भगवानों के स्नान के लिए सोने के 108 कलशों में जल भरकर उसमें कस्तूरी, केसर, चंदन और औषधियां मिलाई गईं। तीनों देवताओं को स्नान मंडप में विराजित कर विशेष विधि से स्नान कराया गया। भगवान जगन्नाथ को 35, बलभद्र को 33 और सुभद्रा को 22 कलशों से स्नान कराया गया। स्नान के दौरान काष्ठमूर्ति को जल की क्षति से बचाने के लिए उन्हें सूती कपड़ों में लपेटा गया।
स्नान के बाद अस्वस्थ होते हैं भगवान
मान्यता है कि अत्यधिक जलस्नान के कारण भगवान जगन्नाथ को ज्वर हो जाता है। इसके बाद उन्हें अनवसर कक्ष में विश्राम हेतु रखा जाता है। मंदिर के पट 11 जून से 25 जून तक बंद रहेंगे। इस अवधि में केवल वैद्य सेवक ही भगवान की सेवा करते हैं।
आयुर्वेदिक उपचार और विशेष भोग
बीमारी की अवस्था में भगवान को आभूषण नहीं पहनाए जाते, केवल श्वेत सूती वस्त्र दिए जाते हैं। आहार में केवल फल, जूस व तरल पदार्थ दिए जाते हैं। 5वें दिन उड़ीसा के मठ से ‘फुलेरी तेल’ आता है जिससे भगवान की मालिश की जाती है। रक्त चंदन, कस्तूरी, और दशमूलारिष्ट जैसी औषधियों से उपचार कर भगवान को पुनः स्वस्थ किया जाता है।
15 दिन का एकांतवास, दर्शन रहेंगे बंद
11 से 25 जून तक भगवान किसी को दर्शन नहीं देंगे। 56 भोग की बजाय औषधीय भोग अर्पित किए जाएंगे। इसके बाद 26 जून को नवयौवन दर्शन और 27 जून को रथयात्रा निकाली जाएगी, जिसमें तीनों देवताओं की रथों पर भव्य सवारी निकाली जाती है।
मंदिर के भीतर ‘सोने की ईंटों वाला कुआं’
स्नान जल मंदिर परिसर में बने विशेष कुएं से लिया जाता है जिसे स्वर्णकूप कहा जाता है। मान्यता है कि इसमें सभी तीर्थों का जल समाहित है। दीवारों पर पांड्य राजा इंद्रद्युम्न द्वारा लगाई गईं स्वर्ण ईंटें आज भी दिखाई देती हैं। श्रद्धालु यहां पूजा के दौरान सोने की वस्तुएं कुएं में अर्पित करते हैं।








