वाराणसी। शहर की पहचान बन चुकीं दो ऐतिहासिक दुकानों—’पहलवान लस्सी’ और ‘चाची की कचौड़ी’—को मंगलवार देर रात बुलडोजर चला कर गिरा दिया गया। ये दोनों दुकानें लंका चौराहे के पास स्थित थीं और पीढ़ियों से बनारसी स्वाद की पहचान मानी जाती थीं। दुकानें हटाए जाने के दौरान पहलवान लस्सी के मालिक मनोज यादव भावुक होकर जमीन को प्रणाम करते नजर आए। वहीं, कुल 30 दुकानों को तोड़ा गया है।
सड़क चौड़ीकरण परियोजना की जद में आईं दुकानें
लहरतारा से भिखारीपुर, लंका चौराहा होते हुए विजया मॉल तक बनने वाली 9.512 किमी लंबी फोरलेन सड़क के निर्माण के लिए 241.80 करोड़ रुपये की लागत से परियोजना चल रही है। इसी सड़क निर्माण के लिए जिन दुकानों को तोड़ा गया, वे संकट मोचन मंदिर के महंत के परिवार की थीं और किराए पर चलाई जा रही थीं। PWD ने एक माह पहले ही नोटिस जारी कर दिया था।
मनोज यादव ने तोड़ी दुकान को देखकर किया प्रणाम
75 साल पुरानी ‘पहलवान लस्सी’ की दुकान के मालिक मनोज यादव जब बुलडोजर को दुकान की ओर बढ़ते देखे, तो हाथ जोड़कर दुकान के सामने खड़े हो गए। उन्होंने जमीन को प्रणाम किया और भावुक नजरों से दुकान को टूटते हुए देखा। फिलहाल उन्होंने नया ठिकाना तय नहीं किया है।
‘पहलवान लस्सी’ थी काशी की शान
‘अगर अस्सी नहीं गए, तो पहलवान की लस्सी ही सही’—काशी में यह कहावत आम थी। पहलवान लस्सी कुल्हड़ में मलाई, दही और रबड़ी के खास मेल से बनती थी। इसका स्वाद केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया तक के पर्यटक भी चख चुके थे। यहां 8 वैरायटी की लस्सी मिलती थी, जिसकी कीमत 30 से 180 रुपये तक होती थी।
‘चाची की कचौड़ी’ भी हुई इतिहास
103 साल पुरानी ‘चाची की कचौड़ी’ भी अब इतिहास बन गई। चाची के जाने के बाद दुकान को परिजनों ने संभाला, लेकिन अब ये भी टूट चुकी है। हींग-और-दाल की डबल लेयर कचौड़ी, सीताफल की सब्जी और मटका जलेबी यहां की पहचान थी। यहीं नहीं, गाली देकर कचौड़ी परोसने का अंदाज़ ही इस दुकान को मशहूर बनाता था। स्थानीय लोगों का मानना था कि चाची की गाली में भी आशीर्वाद छिपा होता था।
प्रशासन का दावा– दिया जाएगा मुआवजा
प्रशासन की ओर से दावा किया गया है कि जिन दुकानदारों की दुकानें तोड़ी गई हैं, उन्हें नियमानुसार मुआवजा दिया जाएगा। फिलहाल प्रभावित दुकानदारों की सूची तैयार की जा रही है।
वाराणसी के स्वाद और संस्कृति को लगा झटका
वाराणसी की दो ऐतिहासिक दुकानों का यूं मिट जाना सिर्फ एक व्यावसायिक नुकसान नहीं, बल्कि शहर की संस्कृति और स्वाद पर एक गहरी चोट है। आने वाले दिनों में ये दुकानों की यादें ही रह जाएंगी, जो पीढ़ियों तक किस्सों में जिंदा रहेंगी।








