वाराणसी। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी की रथयात्रा का शुभारंभ गुरुवार को भोर में मंगला आरती के साथ हुआ। प्रभु का भव्य श्रृंगार कर उन्हें रथ पर आसीन किया गया और 56 प्रकार का भोग अर्पित किया गया। इसके साथ ही काशी के प्रसिद्ध तीन दिवसीय रथ यात्रा मेले की शुरुआत हो गई।
पुजारी राधेश्याम पांडेय ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार, स्नान यात्रा के बाद भगवान 15 दिन बीमार रहते हैं और इस दौरान उन्हें विशेष जड़ी-बूटीयुक्त काढ़ा और परवल का जूस भोग में अर्पित किया जाता है। फिर 26 जून को उनकी पालकी यात्रा निकाली गई, जो नगर भ्रमण कर मंदिर में रात्रि विश्राम के बाद रथ यात्रा मेले में परिवर्तित हो गई। यह मेला 27 जून से 29 जून तक चलेगा।
काशी का लख्खा मेला
यह मेला काशी के ‘लख्खा मेलों’ में शुमार है। मान्यता है कि हर दिन इसमें एक लाख से अधिक श्रद्धालु शामिल होते हैं। नगर की सड़कों पर ग्रामीण झलकियां, चरखी, खिलौनों की दुकानें, नन खटाई और बिस्कुट स्टॉल दिखाई देते हैं। शाम होते ही मेले में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है और रथ यात्रा में प्रभु जगन्नाथ का रथ नगर भ्रमण करता है। हर दिन भोर में मंगला आरती की परंपरा निभाई जाती है।
1857 की क्रांति के बाद बंद हुआ मंदिर का राजस्व
काशी के जगन्नाथ मंदिर में पुरी की तरह नियम लागू हैं। बताया जाता है कि 1857 की क्रांति के बाद जब भोसले साम्राज्य अंग्रेजों के अधीन हो गया, तब मंदिर की संपत्तियों पर अवैध कब्जा हो गया और मंदिर को मिलने वाला राजस्व बंद कर दिया गया। इसके बाद बेनीराम को मंदिर का मैनेजर नियुक्त किया गया और तब से उनकी पीढ़ियां मंदिर की पूजा-पाठ की परंपरा को निभा रही हैं।
माना जाता है कि 1818 में पुरी से लौटे ब्रह्मचारी जी ने अस्सी घाट पर समाधि ली थी। मंदिर में आज भी उनके वस्त्र और पूजन सामग्री की पूजा की जाती है। रथ यात्रा की इस परंपरा को लगातार 221 वर्षों से निभाया जा रहा है।








