- वर्ष 2005 से प्रांतीय खंड में कार्यरत रंजीत कुमार गोड का ट्रांसफर बार-बार रोका गया
- अप्रैल 2025 में आदेश जारी होने के बावजूद कुछ ही दिनों में ट्रांसफर आदेश पर रोक
- संघ पदाधिकारी होने का दावा बना ट्रांसफर रोकने की ढाल, विभागीय रिकॉर्ड में स्थिति अस्पष्ट
अंबेडकरनगर। लोक निर्माण विभाग के प्रांतीय खंड में प्रधान सहायक रंजीत कुमार गोड का लगातार स्थान बनाए रखना विभागीय स्थानांतरण नीति की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर रहा है। वर्ष 2005 से इसी खंड में कार्यरत रंजीत कुमार का स्थानांतरण 24 अप्रैल 2025 को अन्य 15 प्रधान सहायकों के साथ किया गया था, लेकिन कुछ ही दिनों में उनका आदेश रोक दिया गया।
संघ पदाधिकारी का दावा बन रहा ढाल
सूत्रों की मानें तो प्रधान सहायक रंजीत कुमार गोड ने अपने आप को उत्तर प्रदेश लोक निर्माण मिनिस्ट्रियल एसोसिएशन का पदाधिकारी बताते हुए स्थानांतरण आदेश पर रोक लगवा दी। हालांकि, विभागीय अभिलेखों में उनकी कोई वैध पदाधिकारी स्थिति स्पष्ट नहीं है। इसी तरह 2021-22 में भी स्थानांतरण आदेश जारी होने के बावजूद उन्होंने पदाधिकारी होने का दावा करते हुए ट्रांसफर रुकवाया था।
लोक निर्माण विभाग के अधिकारियों की माने तो रंजीत कुमार गोड प्रांतीय खंड की शिथिलता व विशेष स्वीकृति पत्रावलियों से लेकर शिफारिशों संबंधी कई प्रमुख फाइलों का कार्य देख रहे हैं। विभागीय निर्णयों पर प्रभाव होने के कारण ही वे लगातार अपने तबादले पर रोक लगवाने में सफल रहे हैं।
लोक निर्माण विभाग में संघ पदाधिकारी के नाम पर स्थानांतरण में विशेष छूट या स्थगन की व्यवस्था रहती है, लेकिन यदि कोई कर्मचारी वास्तव में पदाधिकारी नहीं है और फिर भी इसका लाभ ले रहा है, तो यह न केवल स्थानांतरण प्रक्रिया को त्रस्त करता है, बल्कि अन्य कर्मचारियों के लिए असमानता का कारण भी बनता है।








