
कोच्चि। केरल हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि पति द्वारा बिना वजह पत्नी पर शक करना मानसिक क्रूरता का गंभीर रूप है, जो वैवाहिक जीवन को नर्क बना सकता है।
जस्टिस देवन रामचंद्रन और एम.बी. स्नेहलता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी एक महिला की तलाक याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने कहा कि “विवाह भरोसे, प्रेम और सम्मान पर आधारित होता है। जब भरोसे की जगह शक ले लेता है, तो रिश्ते का अर्थ खत्म हो जाता है।”
फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द, महिला को तलाक की अनुमति
हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के वि. भगत बनाम डी. भगत (1994) के फैसले का हवाला दिया और महिला की तलाक याचिका को मंजूर किया।
इससे पहले कोट्टायम फैमिली कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि “ऐसे रिश्ते में बने रहना महिला के आत्म-सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए घातक है।”
कोर्ट की टिप्पणी: “शक शादीशुदा जिंदगी को नर्क बना देता है”
जजों ने कहा कि शादी भरोसे, प्यार और समझ पर टिकी होती है।
अगर पति हर वक्त पत्नी पर शक करता रहे, तो यह न केवल महिला की आत्म-सम्मान को ठेस पहुंचाता है, बल्कि उसका जीवन डर और तनाव से भर देता है।
“भरोसे की जगह शक आने पर रिश्ता अपनी खूबसूरती खो देता है। पत्नी को भी गरिमा और आजादी से जीने का हक है।”
डिवोर्स एक्ट की धारा 10(1)(x) के तहत फैसला
कोर्ट ने कहा कि पति का ऐसा व्यवहार ‘गंभीर मानसिक क्रूरता’ के अंतर्गत आता है, जो डिवोर्स एक्ट 1869 की धारा 10(1)(x) में स्पष्ट रूप से परिभाषित है।
इसलिए निचली अदालत का आदेश रद्द कर तलाक को मंजूरी दी गई।








