मनुष्य तभी शांत हो सकता है जब उसकी इच्छाएं एकाग्र हों

अंबेडकरनगर। अकबरपुर के मीरपुर शेखपुर गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दौरान रविवार को कथा स्थल भक्तिमय रहा। कथा वाचन में आचार्य शांतनु ने भगवान कृष्ण व गोपियों की महारास लीला का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि संसार में प्राप्त होने वाली उपलब्धियां बाहरी होती हैं, परंतु वास्तविक मिलन तब होता है जब मनुष्य स्वयं को दिव्य चरणों में समर्पित कर देता है।

महारास लीला का आध्यात्मिक संदेश

कथा के दौरान आचार्य ने कहा कि गोपियों को केवल स्त्री स्वरूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाना चाहिए। उनके अनुसार गोपियां चेतना की वह अवस्था हैं, जहां साधक के भीतर स्त्री-भाव और पुरुष-भाव दोनों समाप्त हो जाते हैं और शेष रहता है केवल दिव्य भाव।

उन्होंने कहा कि जब साधक की चेतना इस स्तर पर पहुंचती है कि संसार का कोई भी आकर्षण उसे विचलित नहीं करता, तब ही भीतर महारास आरंभ होता है। आज मनुष्य की व्यथा का कारण उसका बिखरा हुआ मन है। जहां मन बिखरेगा, वहां शांति प्राप्त नहीं हो सकती।

स्वार्थ का त्याग ही आनंद का मार्ग

कथा में आचार्य शांतनु ने कहा कि जब तक मनुष्य अपनी उपलब्धियों, परिवार, धन और क्षमताओं के प्रति ‘मेरा’ भाव रखता है, तब तक उसकी पीड़ा समाप्त नहीं होती। जैसे ही मनुष्य यह स्वीकार कर लेता है कि जो भी है, वह सब उसी की कृपा है, तभी भीतर आनंद का विस्तार होता है।

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