
अंबेडकरनगर। जिले में स्थित श्रवण धाम का उल्लेख रामायण में अत्यंत महत्वपूर्ण रूप से मिलता है। यह वही स्थान माना जाता है, जहां अयोध्या के राजा दशरथ से अनजाने में श्रवण कुमार का वध हो गया था, जिसके बाद श्रवण के माता–पिता द्वारा दिए गए श्राप से आगे चलकर राम के वनवास की कथा प्रारम्भ होती है।
माना जाता है कि इसी घटना ने रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों की दिशा तय की और युगों से यह स्थल पौराणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है।
तीन नदियों के संगम पर स्थित पवित्र धाम
अकबरपुर मुख्यालय से लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित यह क्षेत्र अवध प्रान्त का अहम हिस्सा रहा है। श्रवण धाम तीन प्रमुख नदियों—मड़हा, विसुही और तमसा—के संगम पर बसा है। संगम का शांत वातावरण और प्राकृतिक सुंदरता इस स्थान को विशेष पवित्रता प्रदान करती है।
तमसा नदी का उल्लेख रामायण में कई बार मिलता है और श्रवण धाम की पौराणिक पहचान भी इसी नदी तट पर घटित घटनाओं से जुड़ी है।
शिकार के दौरान घटी ऐतिहासिक त्रासदी
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, राजा दशरथ एक दिन इस क्षेत्र में शिकार खेलने पहुंचे थे। नदी किनारे जल भरने की दिशा से ध्वनि सुनकर उन्होंने उसे मृग समझने की भूल कर दी और शब्द भेदी बाण चला दिया।
वह बाण श्रवण कुमार को लगा, जो अपने अंधे माता–पिता को कांवड़ पर बैठाकर तीर्थ यात्रा पर निकले हुए थे और माता–पिता की प्यास बुझाने के लिए तमसा नदी से जल लेने गए थे।









