
जिले में डॉक्टरों के 167 पदों में से केवल 78 पद ही भरे
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की भारी कमी, मरीज परेशान
मरीजों को इलाज के लिए निजी अस्पतालों का रुख करने पर मजबूरी
अम्बेडकरनगर। एक ओर प्रदेश सरकार ‘स्वस्थ उत्तर प्रदेश – समर्थ समाज’ के लक्ष्य को लेकर हर नागरिक तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाने का सपना देख रही है, वहीं दूसरी ओर ज़िले का स्वास्थ्य तंत्र खुद बीमार होता जा रहा है। जिले में डॉक्टरों की भारी कमी ने स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बद से बदतर कर दी है।
स्वास्थ्य विभाग के ताजा आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जिले में चिकित्सकों के 167 स्वीकृत पदों में से सिर्फ 78 पदों पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं। यानी आधे से भी कम स्टाफ के भरोसे पूरा स्वास्थ्य सिस्टम चलाया जा रहा है।
गांवों की हालत और बदतर
ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में हालात और भी खराब हैं। कई केंद्र सिर्फ एक या दो डॉक्टरों के सहारे चल रहे हैं। मरीजों की भीड़, लंबा इंतज़ार और बार-बार रेफर की जाने वाली स्थिति अब आम हो गई है।
प्रसूता और गंभीर मरीज सबसे ज्यादा प्रभावित
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण सबसे ज्यादा असर प्रसूता महिलाओं, गंभीर रोगियों और बच्चों पर पड़ रहा है। सही समय पर इलाज न मिलने से इन मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव दोनों झेलना पड़ता है।
सरकारी अस्पतालों की सेवाएं घट रहीं, उम्मीदें टूटीं
एक समय था जब एक रुपये की पर्ची में इलाज की उम्मीद की जाती थी। लेकिन डॉक्टरों की कमी ने इस भरोसे को कमजोर कर दिया है। हड्डी, नेत्र, स्त्री रोग, बाल रोग, और हृदय रोग जैसे महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञों की भारी कमी है।
CMO ने स्वीकार की कमी, जल्द नियुक्तियों की उम्मीद
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सालिकराम पासवान ने स्थिति को गंभीर मानते हुए कहा, “हम सीमित संसाधनों में बेहतर सेवा देने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। उच्च अधिकारियों को डॉक्टरों की कमी की सूचना भेज दी गई है, जल्द ही नई नियुक्तियों की उम्मीद है।”








