शर्मनाक सच- हमने अपनी ही नदी को क्यों मार डाला?

  • तमसा का दर्द: जब नदियाँ रोती हैं
  • कचरे का अंबार, नदी का अंत
  • क्या सरकार सुनेगी तमसा की चीख?

जलालपुर। तमसा नदी—जिसका नाम सुनते ही मन में श्रद्धा और ताजगी की छवि उभरती थी, आज अपने ही नाम के साथ जी रही है। कभी गाँवों की जीवनदायिनी, आस्था और जीवन का केंद्र रही यह नदी अब प्रदूषण और उदासीनता की मार झेल रही है। उसकी कल-कल ध्वनि अब चीख़ में बदल चुकी है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।

जब पानी में उतरा काला जहर

तमसा का जल आज न स्नान लायक है, न पीने लायक, न ही सिंचाई लायक। 12 से अधिक गंदे नाले सीधे नदी में गिरते हैं, जिनका जहरीला पानी नदी की पवित्रता को नष्ट कर चुका है। किनारों पर कूड़े के पहाड़, प्लास्टिक की थैलियों का अंबार और सीवर के झाग ने तमसा को एक “गंदे नाले” में तब्दील कर दिया है। स्थानीय किसान रामकिशोर यादव बताते हैं, “पहले इसी पानी से खेत सींचते थे, अब तो फसलें मरने लगी हैं।”

“हमने खो दिया अपनी विरासत”

तमसा के किनारे कभी भजन-कीर्तन की गूँज सुनाई देती थी, आज वहाँ सिर्फ मच्छरों का सन्नाटा है। स्थानीय युवा नेता विकास निषाद कहते हैं, “यह सिर्फ नदी नहीं मर रही, हमारी संस्कृति और पहचान मर रही है।” भाजपा नेता देवेश पांडेय का आरोप है कि “नगर प्रशासन की लापरवाही ने तमसा को मौत के कगार पर पहुँचा दिया।”

प्रशासन का दावा vs ज़मीनी हकीकत

उपजिलाधिकारी पवन जायसवाल ने बताया कि “तमसा को बचाने के लिए सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।” लेकिन स्थानीय निवासी पूछते हैं—“कब तक? जब तक नदी पूरी तरह सूख न जाए?” तमसा श्रेष्ठ संस्था के अध्यक्ष केशव प्रसाद श्रीवास्तव का कहना है कि “अगर अभी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।”

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