
- हनुमानगढ़ी से पहली बार बाहर निकले गद्दीनशीन महंत
- अक्षय तृतीया पर भव्य शोभायात्रा का आयोजन
- सपने में हनुमान जी का आदेश बना परिवर्तन का कारण
अयोध्या । अयोध्या के ऐतिहासिक हनुमानगढ़ी मंदिर की 288 साल पुरानी परंपरा इस अक्षय तृतीया के दिन टूटी, जब पहली बार वहां के गद्दीनशीन महंत मंदिर परिसर से बाहर निकले। महंत प्रेमदास ने रामलला के दर्शन किए, जो अब तक की परंपराओं के विरुद्ध एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है।
महंत प्रेमदास वर्ष 2016 में हनुमानगढ़ी के 22वें गद्दीनशीन बने थे। उन्होंने बताया कि उन्हें सपने में हनुमान जी के दर्शन हुए, जिन्होंने रामलला के दर्शन करने का आदेश दिया। इसके बाद 21 अप्रैल को अखाड़े की बैठक बुलाई गई, जिसमें परंपरा में बदलाव पर सहमति बनी।
बुधवार को अक्षय तृतीया के शुभ अवसर पर महंत प्रेमदास हाथी, घोड़े, बैंड-बाजे और शंखनाद के साथ पूरे धार्मिक उल्लास के साथ हनुमानगढ़ी से बाहर निकले। सरयू तट पर शिष्यों संग स्नान कर उन्होंने फरसा लहराया और “जय श्रीराम” तथा “हनुमान जी” के जयकारे लगाए। इसके पश्चात रामलला मंदिर पहुंचकर दर्शन किए और भोग अर्पित किया। उन्होंने मंदिर में लगभग एक घंटे तक साधना की और कहा, “रामलला के दर्शन कर परम आनंद की अनुभूति हुई।”
1737 से चल रही थी परंपरा
हनुमानगढ़ी की परंपरा वर्ष 1737 से चली आ रही है, जिसमें गद्दीनशीन महंत का पूरा जीवन मंदिर परिसर में ही व्यतीत होता है। 1925 में लिखे गए हनुमानगढ़ी संविधान के अनुसार, महंत मंदिर परिसर की 52 बीघे जमीन तक ही सीमित रहते हैं और मृत्यु के उपरांत ही उनका शरीर परिसर से बाहर जा सकता है।
अदालत भी पहुंची थी मंदिर परिसर
संकट मोचन सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत ज्ञानदास के उत्तराधिकारी संजय दास ने बताया कि संविधान इतना सख्त है कि गद्दीनशीन महंत स्थानीय अदालतों में भी हाजिर नहीं होते थे। 1980 के दशक में जब कानूनी विवाद हुआ, तब अदालत की कार्यवाही हनुमानगढ़ी परिसर में ही की गई थी, जहां जजों ने मंदिर में बैठकर सुनवाई की।
ऐतिहासिक कदम, नई शुरुआत
महंत प्रेमदास द्वारा परंपरा तोड़कर रामलला के दर्शन करना केवल व्यक्तिगत आस्था नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा जा रहा है। यह परंपरागत सीमाओं से आगे बढ़कर एक नए अध्याय की शुरुआत हो सकती है।








