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स्वयं सहायता समूहों के दम पर ग्रामीण महिलाएं बदल रहीं हैं आर्थिक समीकरण
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NRLM के ज़रिए छोटे कदमों से बड़े सपनों तक की उड़ान
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सिलाई से लेकर स्टार्टअप तक — गांव की महिलाओं का बदला नजरिया
अंबेडकरनगर। हर मुस्कुराता चेहरा एक कहानी कहता है — संघर्ष की, उम्मीदों की और आत्मनिर्भरता की। जब यह मुस्कान किसी ग्रामीण महिला के चेहरे पर खिलती है, तो वह अकेली नहीं होती, बल्कि एक बदलते समाज की तस्वीर होती है। अंबेडकरनगर में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत ऐसी ही कहानियों की एक लंबी फेहरिस्त बन रही है, जहां हज़ारों महिलाएं अब ‘लखपति दीदी’ बन अपने सपनों को साकार कर रही हैं। प्रदेश सरकार ने तीन वर्षों में 60,318 महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त करने का लक्ष्य तय किया है। यह कोई साधारण योजना नहीं, बल्कि वर्षों से हाशिए पर रह चुकी नारीशक्ति को आर्थिक मुख्यधारा में लाने की एक ठोस पहल है।
एक साल में 16,000 महिलाएं बनीं ‘लखपति दीदी’
पिछले एक साल में 16 हज़ार से अधिक महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के ज़रिए अपने छोटे-छोटे कारोबार शुरू कर आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा चुकी हैं। अचार-पापड़ बनाना हो या जूट उत्पादों की बिक्री, पशुपालन हो या सब्जी उत्पादन — महिलाएं अब सिर्फ घर नहीं, व्यापार भी संभाल रही हैं।
योजना का कार्यशैली मॉडल
NRLM के तहत पहले महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों से जोड़ा जाता है। इसके बाद रिवॉल्विंग फंड, कम्युनिटी इन्वेस्टमेंट फंड (CIF), और कैश क्रेडिट लिमिट जैसी आर्थिक सहायता योजनाओं के माध्यम से उन्हें उद्यमिता के लिए तैयार किया जाता है। यही वजह है कि आज गांवों में महिलाएं छोटे-मोटे कामों से शुरू कर लाखों की आमदनी तक पहुँच रही हैं।








