दीपोत्सव पर मिट्टी के दीयों से जगमगाए घर

अंबेडकर नगर, संवाददाता। दीपावली जैसे पावन पर्व के अवसर पर भारतीय संस्कृति को संरक्षित रखने की दिशा में समाजसेवी सुधांशु प्रजापति ने एक अहम संदेश देते हुए मिट्टी के दीयों के उपयोग को बढ़ावा देने की अपील की है। उन्होंने कहा कि दीपोत्सव केवल रोशनी का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतीक है।

गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है दीपावली
सुधांशु प्रजापति ने कहा कि भारत की विविधता इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। जातीय, भाषाई, सांस्कृतिक और धार्मिक भिन्नताओं के बावजूद यहां एकता की डोर ने सभी को एक सूत्र में बांधा है। दीपावली इस एकता का एक सुंदर उदाहरण है, जो हर वर्ग और समुदाय द्वारा उल्लास से मनाया जाता है।

मिट्टी के दीयों से बढ़ेगी भारतीयता की चमक
उन्होंने कहा कि दीपावली पर परंपरागत रूप से मिट्टी के दीयों को जलाने की परंपरा रही है। आधुनिक समय में चाइनीज लाइटों और कृत्रिम सजावटों के कारण यह परंपरा कमजोर होती जा रही है। ऐसे में भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि हम फिर से मिट्टी के दीयों की ओर लौटें।

विदेशी उत्पादों का बहिष्कार, स्वदेशी को बढ़ावा
प्रजापति ने बताया कि आज जब देश में ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलें चल रही हैं, तब हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह स्वदेशी उत्पादों को प्राथमिकता दे। इससे न केवल भारतीय संस्कृति को संबल मिलेगा, बल्कि देश के लघु उद्योगों को भी मजबूती प्राप्त होगी।

कुम्हार समाज को मिले प्रोत्साहन
उन्होंने विशेष रूप से कुम्हार समाज के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि दीयों, मूर्तियों और पारंपरिक खिलौनों के निर्माण में यह समाज अहम भूमिका निभाता है। यदि हम दीपावली पर मिट्टी के दीए और पारंपरिक खिलौने खरीदें, तो कुम्हार समाज के बच्चों के लिए भी यह पर्व खुशियों से भरा होगा।

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