क्या शास्त्रीय संगीत का तकनीकी पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है?

  • शास्त्रीय संगीत के इतिहास से परिचित हुए प्रशिक्षु
  • संगीत की विविधता और रागों की उत्पत्ति पर विस्तृत चर्चा
  • भारतीय संगीत की कला और संस्कृति का अद्भुत संगम

अम्बेडकरनगर। बीएनकेबी पीजी कॉलेज में संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश, भातखंडे संस्कृति विश्वविद्यालय, संत गोबिंद साहब कल्चरल क्लब और महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 15 दिवसीय सुगम संगीत कार्यशाला के तहत बुधवार को प्रतिभागियों को भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास और विविध पहलुओं से रूबरू कराया गया।

कार्यशाला में प्रशिक्षक सचिन गिरी ने उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत के विकास, विभिन्न घरानों की परंपराओं और रागों की उत्पत्ति के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि भारतीय संगीत न सिर्फ एक कला है, बल्कि यह हमारी सभ्यता और संस्कृति का प्रतिबिंब भी है।

महाविद्यालय की प्राचार्या प्रो. शुचिता पांडेय ने कहा कि शास्त्रीय संगीत भारतीय संस्कृति की आत्मा है और युवाओं को इसे समझने व अपनाने की जरूरत है। उन्होंने छात्रों से संगीत के प्रति रुचि विकसित करने की अपील की।

विभागाध्यक्ष जयमंगल पांडेय ने संगीत और साहित्य के गहरे संबंधों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये दोनों कलाएं मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाती हैं। वहीं, मीडिया संयोजक डॉ. शशांक मिश्र ने इस कार्यशाला को प्रतिभा निखारने का एक सशक्त मंच बताया।

कार्यक्रम में प्रो. श्वेता रस्तोगी, मनोज श्रीवास्तव, अंचल चौरसिया, सुधीर मिश्रा, आशीष चतुर्वेदी सहित कई शिक्षक और प्रशिक्षु मौजूद रहे। संयोजक वागीश शुक्ल ने कार्यक्रम का संचालन किया।

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