नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई हुई। कोर्ट ने केंद्र सरकार से 8 हफ्तों के भीतर लिखित जवाब देने को कहा। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि केवल संवैधानिक बहस के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत और सुरक्षा हालात को देखते हुए फैसला किया जाएगा।
CJI ने कहा- बिना जवाब आगे नहीं बढ़ सकते
मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा, “पहलगाम जैसे आतंकी हमलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कोर्ट को लिखित जवाब दिए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता।”
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि केंद्र पहले ही चुनावों के बाद राज्य का दर्जा बहाल करने का आश्वासन दे चुका है और इस पर काम हो रहा है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क- राज्य में हालात सामान्य
याचिकाएं प्रोफेसर जहूर अहमद भट और सामाजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अहमद मलिक ने दायर की थीं। उन्होंने कहा कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव शांतिपूर्वक हुए, जिससे साफ है कि सुरक्षा हालात और लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं सामान्य हैं। लेकिन राज्य का दर्जा बहाल न होने से संघीय ढांचा कमजोर हो रहा है।
धारा 370 क्यों हटाई गई थी?
5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया था। इसके बाद राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में बांटा गया। सरकार का कहना था कि यह कदम राष्ट्रीय एकता, विकास और आतंकवाद पर रोक के लिए जरूरी था।
पिछला आदेश क्या था?
11 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 हटाने को सही ठहराया था। तब कोर्ट ने केंद्र से कहा था कि सितंबर 2024 तक विधानसभा चुनाव कराए जाएं और उसके बाद राज्य का दर्जा बहाल किया जाए। लेकिन 21 महीने बाद भी बहाली पर स्पष्ट प्रगति नहीं हुई है।








