- बेगम मल्लिका आलिया को आया था दिव्य स्वप्न
- हाथियों के रुकने पर तय हुआ मंदिर का स्थान
- अलीगंज मंदिर की स्थापना 1760 के करीब
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ज्येष्ठ महीने के मंगलवार किसी त्योहार से कम नहीं होते। इन्हें बड़ा मंगल कहा जाता है और इस दिन शहर की गलियों से लेकर मंदिरों तक भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है। शहर के कोने-कोने में विशाल भंडारे लगते हैं, जिनमें पूड़ी-कचौड़ी से लेकर शरबत और प्रसाद तक वितरित होता है। इस बार ज्येष्ठ माह में 5 बड़े मंगल पड़ रहे हैं, जिसमें शहर की करीब 25% आबादी किसी न किसी रूप में हिस्सा लेगी।
लेकिन यह परंपरा यूं ही शुरू नहीं हुई। इसका इतिहास लगभग 400 साल पुराना है और इसकी जड़ें अवध की गंगा-जमुनी तहजीब से जुड़ी हैं।
जब नवाबी ख्वाब ने मंदिर की नींव रखी
इस परंपरा की शुरुआत अवध के तीसरे नवाब शुजाउद्दौला की बेगम मल्लिका आलिया के एक दिव्य स्वप्न से जुड़ी है। उन्हें लगातार कई रातों तक एक विशेष स्थल पर हनुमानजी की मूर्ति के दर्शन हुए। पंडितों और मौलवियों की सलाह पर एक हाथी फैजाबाद से लाया गया और उसे पूजा कर रवाना किया गया। लेकिन वह हाथी गोमती नदी के तट पर आकर बैठ गया। जब दूसरा और फिर तीसरा हाथी भी वहीं आकर रुका, तो इसे ईश्वरीय संकेत माना गया।
खुदाई में उसी स्थान पर हनुमानजी की मूर्ति मिली। बेगम ने वहीं मंदिर बनवाने का निर्णय लिया। यह वही मंदिर है जो आज अलीगंज हनुमान मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
बेगम ने दिलाई प्रसाद की व्यवस्था, दान में दी जमीन
मंदिर के निर्माण के बाद जब पुजारी बेगम से मिलने पहुंचे, तो उन्होंने पूछा कि क्या श्रद्धालुओं के लिए जलपान और प्रसाद की व्यवस्था की गई है? जब ‘नहीं’ में उत्तर मिला, तो उन्होंने कुछ जमीन मंदिर को दान कर दी और कहा कि इसकी आमदनी से भक्तों के लिए प्रसाद की व्यवस्था हो।
इस घटना के बाद हर साल जेठ महीने के मंगल को विशेष आयोजन की परंपरा शुरू हुई। शुरुआत में प्रसाद के रूप में लड्डू, चना और शरबत दिया जाता था, लेकिन अब इसमें पूड़ी, कचौड़ी और सब्जी भी शामिल हो चुके हैं।
एक और मान्यता: हनुमानजी से मांगी गई मन्नत से ठीक हुआ बेटा
एक अन्य कथा के अनुसार, नवाब परिवार की एक सदस्य आलिया बेगम का बेटा गंभीर रूप से बीमार था। जब सभी उपाय असफल हो गए, तो उन्होंने हनुमानजी से मन्नत मांगी। बेटे के स्वस्थ होने पर उन्होंने अलीगंज मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
वहीं यह भी कहा जाता है कि नवाब एक हनुमान मूर्ति को इमामबाड़े के पास स्थापित करना चाहते थे, लेकिन मूर्ति ले जा रहा हाथी गोमती तट पार नहीं कर सका। इस संकेत को मानकर उसी स्थान पर नया हनुमान मंदिर बना और बड़े मंगल की परंपरा का विस्तार हुआ।
पुरानी परंपरा: नंगे पांव भक्तों का मंदिर की ओर चलना
लेटे हनुमान मंदिर के मुख्य पुजारी डॉ. विवेक तांगड़ी बताते हैं कि नवाबों के जमाने से ही परंपरा रही है कि लोग रात 1 बजे घरों से निकलते थे और नंगे पांव या लेटते हुए मंदिर की ओर बढ़ते थे। आज भी कई श्रद्धालु इसी परंपरा को निभाते हैं। यह आस्था, समर्पण और लखनऊ की सांझी संस्कृति का प्रतीक है।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल
बड़ा मंगल के भंडारों में सिर्फ हिंदू ही नहीं, मुस्लिम समुदाय के लोग भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह लखनऊ की उस गंगा-जमुनी तहजीब की जीती-जागती मिसाल है, जहां धर्म से परे सेवा ही सच्चा कर्म माना जाता है।
इतिहासकारों की नजर में
प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. योगेश प्रवीन ने लखनऊ नामा में लिखा है कि गोमती के पार दो प्राचीन हनुमान मंदिर हैं। इनमें से एक मंदिर को 1783 में इत्र व्यापारी लाला जाटमल ने बनवाया था। उस समय महंत खासा राम के आग्रह पर इसका निर्माण हुआ था। इसी मंदिर में जेठ के मंगलवार को भारी संख्या में भक्त उमड़ते हैं।








