संजयन के सपा में आने से बदला शिक्षक एमएलसी चुनाव का समीकरण

भाजपा से टिकट न मिलने के बाद निर्दल नामांकन, फिर सपा में शामिल होकर बने प्रत्याशी; सहानुभूति और संगठन के सहारे चुनावी बढ़त की कोशिश

गोरखपुर। गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का एमएलसी चुनाव अब नए राजनीतिक समीकरण के साथ आगे बढ़ रहा है। भाजपा से टिकट न मिलने के बाद निर्दल प्रत्याशी के रूप में नामांकन करने वाले डॉ. संजयन त्रिपाठी अब समाजवादी पार्टी में शामिल हो गए हैं। सपा ने भी उन्हें इसी सीट से अपना आधिकारिक प्रत्याशी घोषित कर दिया है। इससे पहले पार्टी ने कमलेश यादव को उम्मीदवार बनाया था।

संजयन त्रिपाठी ने नामांकन से पहले अपनी गाड़ी से भाजपा का झंडा उतारकर पार्टी से अलग होने का संकेत दिया था। इस दौरान उनका भावुक वीडियो भी सामने आया था। अब सपा के साथ आने के बाद उनके व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षक संगठनों में प्रभाव और पार्टी संगठन—इन तीनों के सहारे चुनावी रणनीति तैयार करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, उनके पक्ष में बनी सहानुभूति कितनी वोट में बदल पाएगी, यह चुनाव परिणाम के बाद ही स्पष्ट होगा।

निर्दल से सपा प्रत्याशी तक बदला घटनाक्रम

गोरखपुर-फैजाबाद खंड शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद डॉ. संजयन त्रिपाठी ने निर्दल प्रत्याशी के तौर पर पर्चा दाखिल किया था। नामांकन के दौरान उनके साथ बड़ी संख्या में समर्थक और शिक्षक समुदाय से जुड़े लोग मौजूद रहे।

इसके बाद राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदला। संजयन त्रिपाठी ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ग्रहण की और अखिलेश यादव की मौजूदगी में उन्हें पार्टी का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया। सपा ने अपने पहले घोषित प्रत्याशी कमलेश यादव की जगह संजयन को मैदान में उतारा है।

भाजपा का ध्रुव त्रिपाठी पर भरोसा

संजयन के सपा में जाने के बाद भाजपा ने भी अपनी रणनीति पर काम तेज कर दिया है। भाजपा ने इस सीट से मौजूदा एमएलसी ध्रुव कुमार त्रिपाठी को प्रत्याशी बनाया है। ध्रुव कुमार त्रिपाठी इस निर्वाचन क्षेत्र से तीन बार निर्वाचित हो चुके हैं और शिक्षक संगठन के बीच उनका पुराना आधार है।

ऐसे में मुकाबला केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता का नहीं रहेगा। भाजपा के संगठन और मौजूदा एमएलसी की पकड़ के मुकाबले संजयन त्रिपाठी के व्यक्तिगत संपर्क और अब सपा के संगठन की ताकत भी महत्वपूर्ण होगी।

सहानुभूति को वोट में बदलना बड़ी चुनौती

संजयन त्रिपाठी के भाजपा से अलग होने के घटनाक्रम ने उनके पक्ष में सहानुभूति की चर्चा जरूर बढ़ाई है। टिकट न मिलने के बाद उनके भावुक होने और भाजपा का झंडा उतारने की तस्वीरें और वीडियो सामने आए थे। उन्होंने लंबे समय तक पार्टी के साथ काम करने की बात भी कही थी।

हालांकि, वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषकों की राय में सहानुभूति को वोट में बदलना आसान नहीं होता। निर्दल प्रत्याशी के तौर पर जो मतदाता व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर उनके साथ आ सकते थे, उनमें से कुछ मतदाता सपा के प्रत्याशी के रूप में उन्हें स्वीकार करेंगे या नहीं, यह चुनाव का अहम पहलू रहेगा।

स्कूल और शिक्षक संगठनों का रुख महत्वपूर्ण

संजयन त्रिपाठी का शिक्षक और स्कूल प्रबंधन से जुड़ा आधार इस चुनाव में उनकी प्रमुख ताकत माना जा रहा है। वह गोरखपुर स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं और सीबीएसई-आईसीएसई स्कूलों के प्रबंधकों के बीच उनकी सक्रियता रही है। अप्रैल 2026 में भी गोरखपुर स्कूल्स एसोसिएशन की बैठक में उन्हें अध्यक्ष के रूप में रिपोर्ट किया गया था।

नामांकन से पहले कई शिक्षक संगठनों और स्कूल प्रबंधकों की ओर से उनके समर्थन की चर्चा सामने आई थी। लेकिन निर्दल प्रत्याशी से सपा प्रत्याशी बनने के बाद यही समर्थन किस रूप में सामने आता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

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वैचारिक समीकरण भी बनेंगे चुनौती

निर्दल उम्मीदवार के रूप में संजयन त्रिपाठी को समर्थन देने वाले कुछ स्कूल संचालक और शिक्षक संगठन भाजपा या अन्य राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में सपा प्रत्याशी के तौर पर उनके साथ सार्वजनिक रूप से खड़े होने में कुछ लोगों के सामने राजनीतिक असहजता की स्थिति बन सकती है।

यही वजह है कि चुनाव में संजयन के लिए व्यक्तिगत संपर्कों को सपा के संगठनात्मक समर्थन से जोड़ना बड़ी चुनौती होगी। दूसरी ओर, सपा के लिए भी यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संजयन का व्यक्तिगत शिक्षक आधार पार्टी के वोट और संगठन तक कितना प्रभावी ढंग से पहुंचता है।

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