- बिना स्वीकृति के सर्जरी: स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़
- अस्पतालों की सीलिंग की प्रभावहीनता
- तंत्र और भ्रष्टाचार का गहरा रिश्ता
अम्बेडकरनगर। चिकित्सा क्षेत्र में जब सेवा की जगह व्यापार की मानसिकता हावी हो जाती है, तो अस्पताल सेवा के मंदिर नहीं, बल्कि व्यापार की मंडी में तब्दील हो जाते हैं। यह तब होता है, जब सरकारी नियमों और प्रशासनिक प्राधिकरणों की अनदेखी की जाती है और अस्पतालों का संचालन बिना किसी वैध पंजीकरण और स्वीकृति के जारी रहता है।
छापेमारी के बावजूद अवैध अस्पतालों का संचालन
हाल ही में जिले में हुए छापे के दौरान 22 अस्पतालों में से 15 ऐसे पाए गए, जो बिना सर्जरी की स्वीकृति के गंभीर ऑपरेशन कर रहे थे। इन अस्पतालों को तत्काल प्रभाव से सील कर दिया गया था, लेकिन अधिकारियों की मिलीभगत और प्रशासनिक चुप्पी के चलते ये अस्पताल फिर से संचालन में आ गए हैं।
छल-कपट और तंत्र की मिलीभगत
सील किए गए अस्पतालों ने अपना स्थान बदलकर और नाम बदलकर फिर से खुलना शुरू कर दिया है। विशेष रूप से आलापुर क्षेत्र का अस्पताल जो पहले सील किया गया था, अब कनैला बाजार में नए नाम से चल रहा है। इसके अलावा, मरियांव बाजार और बावली चौक पर सील किए गए अस्पताल बिना लाइसेंस के फिर से खुले हैं।
आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका
इन अवैध संस्थानों के संचालन में आशा कार्यकर्ताओं की संलिप्तता भी सामने आई है, जो ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा के आधार माने जाते थे, अब वे अवैध चिकित्सकों के साथ सहयोग कर रहे हैं और सूचनाएं देने का काम कर रहे हैं।
प्रशासनिक विफलता और मिलीभगत
कई अवैध अस्पतालों को जिलाधिकारी के आदेश पर सील किया गया था, लेकिन वे पुनः ‘बैक डोर’ से खोले गए हैं। क्या यह प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सुनियोजित मिलीभगत का संकेत नहीं देता?
जांच प्रक्रिया की खानापूरी
बीते डेढ़ माह में अवैध अस्पतालों के संचालकों ने दस्तावेज पूर्ण करने का दावा किया है, लेकिन विभागीय अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर अपनी जिम्मेदारी से बच रहे हैं। छापेमारी की जांच केवल औपचारिकता तक सीमित है, न कोई ठोस रिपोर्ट, न कोई कार्रवाई, न ही लाइसेंस रद्दीकरण की कार्यवाही।








