- 49 साल बाद आया अदालत का फैसला
- बुजुर्ग आरोपी ने कोर्ट में कबूला जुर्म
- जेल में बीते समय को ही माना गया सजा
झाँसी। अदालत की तारीखों से थक चुके 68 वर्षीय कन्हैया लाल ने शनिवार को कोर्ट में पेशी के दौरान अपना जुर्म कबूल कर लिया। इसके बाद कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए जेल में बिताई अवधी को ही सजा मानते हुए रिहा कर दिया। साथ ही 2000 रुपये का अर्थदंड भी लगाया। जुर्माना जमा करने के बाद वह घर लौट गया।
1976 में दर्ज हुआ था केस, अब आया फैसला
मामला टहरौली थाना क्षेत्र के बमनुआ स्थित एलएसएस सहकारी समिति का है। यहां मध्यप्रदेश के ग्वालियर निवासी कन्हैया लाल पुत्र गजाधर चपरासी के पद पर तैनात था। उसके साथ कर्मचारी लक्ष्मी प्रसाद व रघुनाथ भी काम करते थे। 1976 में तत्कालीन सचिव बिहारीलाल गौतम ने तीनों पर रसीद बुक और 150 रुपए की घड़ी चोरी करने तथा फर्जी हस्ताक्षर कर समिति के सदस्यों से 14,472 रुपए वसूलने का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
पुलिस ने तीनों को गिरफ्तार कर जेल भेजा और बाद में आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया। कुछ समय बाद तीनों को जमानत मिल गई। सुनवाई के दौरान सहआरोपी लक्ष्मी प्रसाद और रघुनाथ की मौत हो गई, जबकि कन्हैया लाल लगातार तारीखों पर उपस्थित होता रहा।
‘अब ताकत नहीं बची साहब…’ कहकर कबूला जुर्म
शनिवार को सुनवाई के दौरान कन्हैया लाल ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मुन्नालाल के समक्ष कहा, “मैं अब 68 साल का हो गया हूं, लगातार तारीखों से परेशान हूं। अब केस लड़ने की ताकत नहीं बची, अपना जुर्म कबूल करता हूं।” इस पर कोर्ट ने आईपीसी की धारा 457, 380, 409, 467, 468 और 120(बी) में दोषी ठहराते हुए सभी धाराओं में जेल में बिताए समय को सजा मानते हुए कुल 2000 रुपए का अर्थदंड लगाया।








