- सुप्रीम कोर्ट ने क्यों भेजी रिपोर्ट सीधे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को?
- जज के बंगले के बाहर अधजले नोटों की गुत्थी क्या है?
- जस्टिस वर्मा पर लगे आरोपों की जांच में कौन-कौन शामिल रहा?
नई दिल्ली: भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी.वाई. चंद्रचूड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश रिकवरी केस की जांच रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सौंप दी है। इस मामले में तीन सदस्यीय कमेटी द्वारा की गई जांच के निष्कर्षों के साथ-साथ जस्टिस वर्मा का जवाब भी शामिल किया गया है।
क्या है पूरा मामला?
- 16 मार्च को जस्टिस वर्मा के आवास (चाणक्यपुरी) के बाहर सफाई कर्मियों को ₹500 के अधजले नोट मिले थे। कर्मचारियों ने दावा किया कि इससे पहले भी ऐसे नोट मिल चुके हैं।
- 21 मार्च को CJI ने इस मामले की जांच के लिए तीन जजों की कमेटी गठित की, जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश के CJI जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।
- 28 मार्च को जस्टिस वर्मा ने कमेटी के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रखा।
- 4 मई को कमेटी ने अपनी रिपोर्ट CJI को सौंपी, जिसे अब कार्यवाही के लिए राष्ट्रपति और पीएम को भेजा गया है।
इलाहाबाद बार एसोसिएशन का विरोध
- जस्टिस वर्मा के दिल्ली हाईकोर्ट से इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर के विरोध में इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने महाभियोग प्रस्ताव पारित किया था।
- बार ने CBI और ED से जांच की मांग की थी और CJI को इसकी सूचना दी थी।
पुलिस और फायर विभाग की जांच
- दिल्ली पुलिस ने 8 कर्मियों के मोबाइल फोन फोरेंसिक जांच के लिए भेजे, ताकि यह पता लगाया जा सके कि आग लगने के समय कोई वीडियो रिकॉर्ड तो नहीं किया गया।
- दिल्ली फायर सर्विस के प्रमुख अतुल गर्ग ने जांच कमेटी के सामने बयान दिया, लेकिन नकदी बरामद होने के दावों से इनकार किया।
2018 का घोटाला भी चर्चा में
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2018 में गाजियाबाद की सिम्भावली शुगर मिल से जुड़े 97.85 करोड़ रुपए के घोटाले में जस्टिस वर्मा का नाम सामने आया था, जब वह कंपनी के नॉन-एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर थे। CBI ने इसकी FIR दर्ज की थी, लेकिन बाद में जांच रुक गई।
अब क्या होग�?
- सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह इन-हाउस प्रोसेस के तहत की गई कार्रवाई है और रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया है।
- अब सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय आगे की कार्यवाही पर फैसला करेंगे।
इस मामले ने न्यायपालिका में जवाबदेही और पारदर्शिता की बहस को फिर से गर्म कर दिया है।








