सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला विवाद पर सुनवाई तेज, धर्म बनाम संविधान पर बहस

9 जजों की संवैधानिक बेंच कर रही सुनवाई

  • महिलाओं की एंट्री और धार्मिक अधिकारों पर बहस
  • याचिकाकर्ता पक्ष ने धर्म को संविधान से पहले का बताया
  • कोर्ट ने ज्यूडिशियल रिव्यू के अधिकार पर दिया संकेत

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक भेदभाव से जुड़े अहम मामले पर बुधवार को सुनवाई जारी रही। इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संवैधानिक पीठ कर रही है, जिसमें धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर गहन बहस हो रही है।

याचिकाकर्ता पक्ष के वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील देते हुए कहा कि धर्म संविधान से पहले से अस्तित्व में था और यह उसकी देन नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि भारत की सभ्यता की निरंतरता का श्रेय हिंदू धर्म, विभिन्न धार्मिक संप्रदायों, भक्ति आंदोलनों और महान आचार्यों को जाता है। इसी कारण संविधान निर्माताओं ने धार्मिक संस्थाओं को विशेष अधिकार दिए हैं।

मंगलवार को कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि यदि राज्य सामाजिक सुधार या जनहित के नाम पर किसी धार्मिक प्रथा पर रोक लगाता है, तो उसकी न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही ज्यूडिशियल रिव्यू की कुछ सीमाएं हैं, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि कोर्ट के पास इस पर कोई अधिकार नहीं है।

यह मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं (10 से 50 वर्ष) के प्रवेश से जुड़ा है। केरल हाईकोर्ट ने 1991 में इस आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में हटा दिया था। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button