
दिल्ली : दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और न्यायपालिका के बीच एक नया संवैधानिक विवाद सामने आया है। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की बेंच से दूरी बना ली है, जिससे कानूनी और राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
‘रिक्यूज़ल’ अर्जी खारिज होने के बाद विवाद
20 अप्रैल 2026 को उनकी रिक्यूज़ल अर्जी खारिज होने के बाद केजरीवाल ने कहा कि न्याय की निष्पक्षता को लेकर उनकी चिंताएं अभी भी बनी हुई हैं। उनका दावा है कि इस फैसले के बावजूद उन्हें निष्पक्ष सुनवाई को लेकर भरोसा नहीं हो पा रहा है।
‘न्यायिक सत्याग्रह’ का रास्ता
केजरीवाल ने इस पूरे मामले को ‘न्यायिक सत्याग्रह’ बताया है। उन्होंने Mahatma Gandhi के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि अन्याय महसूस होने पर शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना जरूरी है।
न्यायपालिका को लेकर बड़ा सवाल
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनता की सबसे बड़ी उम्मीद न्यायपालिका से होती है। अगर एक पूर्व मुख्यमंत्री को न्याय मिलने में संदेह है, तो यह आम नागरिक के लिए भी चिंता का विषय बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प खुला
हालांकि, केजरीवाल ने स्पष्ट किया कि वह कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे हैं और उनके पास सुप्रीम कोर्ट जाने का संवैधानिक अधिकार सुरक्षित है। उन्होंने 90 दिनों के भीतर इस फैसले को चुनौती देने की बात कही है।
कानूनी और राजनीतिक असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला न्यायपालिका और राजनीति के संबंधों पर नई बहस छेड़ सकता है। ‘न्यायिक सत्याग्रह’ का यह कदम भारतीय न्यायिक इतिहास में एक अनोखी स्थिति पैदा कर रहा है।









