मुस्लिम पर्सनल लॉ और भारतीय कानून- बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या किया साफ

  • तलाक के विभिन्न रूपों पर बॉम्बे हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला
  • मुस्लिम महिला अधिनियम: कोर्ट ने क्या कहा?
  • क्या है तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-बिद्दत? जानिए अदालत का निर्णय

मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम निर्णय में कहा कि मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम के तहत केवल तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) पर रोक लगाई गई है, जबकि तलाक-ए-अहसन पर कोई रोक नहीं है। यह टिप्पणी औरंगाबाद बेंच के जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस संजय देशमुख ने दी, जिन्होंने इस मामले में एक व्यक्ति और उसके माता-पिता के खिलाफ मुस्लिम महिला अधिनियम की धारा 4 के तहत दर्ज शिकायत को खारिज कर दिया।

तीन तलाक पर अदालत की स्पष्टता
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तलाक-ए-बिद्दत को दंडनीय मानते हुए इसे अपराध घोषित किया गया है, लेकिन तलाक-ए-अहसन, जिसमें पति अपनी पत्नी को तलाक की घोषणा करता है और तीन महीने की अवधि (इद्दत) के बाद यह तलाक प्रभावी होता है, पर कोई आपत्ति नहीं है।

इस केस में, जलगांव के तनवीर अहमद ने 2023 में अपनी पत्नी को तलाक-ए-अहसन के तहत तलाक दिया था। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसके ससुराल वाले भी इस फैसले में शामिल थे और उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को अस्वीकार करते हुए कहा कि इस मामले में सिर्फ पति को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, ससुराल वालों को नहीं।

क्या है तलाक-ए-अहसन और तलाक-ए-बिद्दत?
इसी बीच, अदालत ने तलाक के विभिन्न प्रकारों का उल्लेख किया। तलाक-ए-अहसन में पति पत्नी को तीन महीने तक एक ही छत के नीचे रहने के बाद तलाक दे सकता है, जबकि तलाक-ए-बिद्दत में पति अपनी पत्नी को कभी भी, कहीं भी, किसी भी माध्यम से तलाक दे सकता है, जो तुरंत प्रभावी होता है और उसे पलटा नहीं जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में सिर्फ तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया था।

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