सुप्रीम कोर्ट समयसीमा तय कर सकता है या नहीं – क्या कहता है संविधान

  • राष्ट्रपति की आपत्ति से संवैधानिक बहस में नया मोड़
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उठे सवाल – किसकी सीमा कहां तक?
  • अनुच्छेद 201 की व्याख्या पर टकराव

नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने की समयसीमा तय करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय से 14 बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा, जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपाल की शक्तियों, न्यायिक दखल और समयसीमा जैसे मुद्दे शामिल हैं।

राष्ट्रपति मुर्मू ने स्पष्ट किया कि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो राष्ट्रपति या राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा से बाध्य करता हो। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समयसीमा तय करना न्यायिक अतिक्रमण जैसा प्रतीत होता है।

विवाद की पृष्ठभूमि: तमिलनाडु मामला

यह पूरा मामला तमिलनाडु के राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच हुए टकराव से शुरू हुआ था, जहां राज्यपाल ने राज्य सरकार के कई विधेयकों को रोककर रख दिया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को ऐतिहासिक फैसला सुनाया, जिसमें कहा गया कि राज्यपाल के पास ‘वीटो पावर’ नहीं है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राज्यपाल की ओर से राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। यह आदेश 11 अप्रैल को सार्वजनिक हुआ।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के 4 अहम बिंदु

  1. निर्णय अनिवार्य:
    अनुच्छेद 201 के तहत यदि कोई विधेयक राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को विचारार्थ भेजा जाए, तो राष्ट्रपति को स्वीकृति या अस्वीकृति का स्पष्ट निर्णय देना होगा।

  2. न्यायिक समीक्षा संभव:
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है, विशेषकर तब जब वह राज्य की कैबिनेट की सलाह के खिलाफ हो या उसमें मनमानी का संदेह हो।

  3. तीन महीने में निर्णय जरूरी:
    राष्ट्रपति को विधेयक मिलने के तीन महीने के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य होगा। यदि देरी होती है, तो उसके कारण बताने होंगे।

  4. बार-बार विधेयक लौटाना मना:
    एक बार विधेयक विधानसभा द्वारा संशोधन या पुनर्विचार के बाद पास हो जाए, तो राष्ट्रपति उसे बार-बार वापस नहीं भेज सकते।

    इस पर उपराष्ट्रपति और विपक्ष की प्रतिक्रियाएं

    17 अप्रैल:
    उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों पर नाराजगी जताते हुए कहा था कि अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं। उन्होंने अनुच्छेद 142 को ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ 24×7 परमाणु मिसाइल’ बताया था।

    18 अप्रैल:
    वरिष्ठ नेता और सांसद कपिल सिब्बल ने धनखड़ के बयान की आलोचना करते हुए कहा था कि जब कार्यपालिका काम नहीं करती, तब न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति एक औपचारिक मुखिया हैं और उन्हें सरकार की सलाह पर ही काम करना होता है।

    राष्ट्रपति मुर्मू के सवालों का महत्व

    राष्ट्रपति मुर्मू द्वारा उठाए गए सवाल अब इस बहस को और गहरा करते हैं कि संवैधानिक पदों की भूमिका क्या हो और न्यायपालिका किस हद तक कार्यपालिका या राष्ट्रपति जैसे पदों के कार्य में हस्तक्षेप कर सकती है। यह मामला केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और संवैधानिक मर्यादाओं से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है।

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