क्या पुलिस और प्रशासन की चुप्पी से बच पाएगी शाह आलम की ज़मीन

  • पुलिस प्रशासन की निष्क्रियता: क्या शाह आलम को मिलेगा न्याय?
  • धार्मिक आयोजन के निरीक्षण के दौरान हुआ हमला, पीड़ित की ज़मीन पर कब्जा करने की कोशिश
  • जब पुलिस ही बन गई अपराधी: शाह आलम का चालान और उसकी न्याय की यात्रा

अम्बेडकरनगर। कानून के राज की धज्जियाँ उड़ती नज़र आईं जब एक बेगुनाह नागरिक की ज़मीन पर अतिक्रमण करने की कोशिश की गई और पुलिस ने पीड़ित के खिलाफ ही कार्रवाई की। यह घटना कोतवाली टाण्डा अंतर्गत ग्राम चिंतौरा में सामने आई है, जहाँ पीड़ित शाह आलम न्याय की गुहार लेकर पुलिस अधीक्षक के दरवाज़े तक पहुँचे हैं।

घटना का विवरण

मीरानपुर निवासी शाह आलम अपनी बैनामाशुदा ज़मीन (ग्राम चिंतौरा) पर 3 अप्रैल की रात करीब 10 बजे पहुँचे, जहाँ आगामी धार्मिक आयोजन की तैयारियाँ चल रही थीं। इसी दौरान हेलाल अशरफ, मोहम्मद आज़म और 10-15 अज्ञात लोग लाठी-डंडों के साथ वहाँ पहुँचे और ज़मीन की तारबंदी तोड़कर पिलर गिराने लगे। शाह आलम के विरोध करने पर उन्हें गालियाँ दी गईं, मारपीट की गई और कपड़े फाड़ दिए गए। इस हमले में 29 पिलर तोड़ दिए गए, जिससे लगभग एक लाख रुपये का नुकसान हुआ। ग्रामीणों के हस्तक्षेप से शाह आलम बच पाए।

पुलिस ने पीड़ित के खिलाफ किया चालान

घटना की रिपोर्ट दर्ज कराने शाह आलम थाना टाण्डा पहुँचे, लेकिन पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय पीड़ित का ही चालान कर दिया। इस पक्षपातपूर्ण रवैये से आहत शाह आलम ने पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजकर निम्न मांगें रखी हैं:

घटना की तुरंत एफआईआर दर्ज की जाए।

आरोपियों को गिरफ्तार किया जाए।

ज़मीन की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

पीड़ित के खिलाफ जारी चालान को रद्द कर निष्पक्ष जाँच की जाए।

प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल

यह मामला पुलिस-प्रशासन की निष्क्रियता और ग्रामीण इलाकों में ज़मीन अतिक्रमण की बढ़ती घटनाओं को उजागर करता है। पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाय पुलिस द्वारा उन्हें ही प्रताड़ित करने की प्रवृत्ति चिंताजनक है। अब न्यायिक हस्तक्षेप ही शाह आलम को न्याय दिला पाएगा।

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