
- संघ प्रमुख ने समाज में समरसता लाने के लिए क्या योजना बनाई?
- जातिवाद और छुआ-छूत के खिलाफ डॉ. भागवत का नया दृष्टिकोण
- गांव-गांव जाकर समरसता का संदेश फैलाने की डॉ. भागवत की पहल
कानपुर। कारवालो नगर स्थित संघ कार्यालय केशव भवन में पांच दिवसीय प्रवास के दौरान डॉ. भागवत ने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम में समरसता को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा, “हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हम किस समय सीमा के भीतर सामाजिक विषमता को समाप्त कर सकेंगे। इसके लिए गांव-गांव जाकर समरसता का संदेश देना होगा और समाज में समता, शोषणमुक्त और जातिवाद से मुक्त भारत की स्थापना करनी होगी।”
समरसता संघ का स्वभाव: डॉ. भागवत
डॉ. भागवत ने संघ के स्वयंसेवकों से कहा कि समरसता केवल संघ की गतिविधि नहीं बल्कि संघ के प्रत्येक स्वयंसेवक का स्वभाव बन चुकी है। उन्होंने बताया, “यहां 25-30 साल तक एक साथ काम करने वाले स्वयंसेवकों को भी एक-दूसरे की जाति का पता नहीं चलता। हमें अपनी कार्यशैली और स्वभाव से समाज में यह मानसिकता फैलानी है।”
सभी जातियों का योगदान
संघ प्रमुख ने यह भी कहा कि सभी जातियों ने देश के उत्थान में योगदान दिया है और संकट के समय संघर्ष कर देश को ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि श्मशान, मंदिर और जलाशयों पर हिंदू समाज की सभी जातियों का समान अधिकार है।
बैठक में क्षेत्र प्रचारक अनिल, प्रांत प्रचारक श्रीराम, प्रांत संघ चालक भवानी भीख तिवारी, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ. अनुपम, क्षेत्र प्रचारक प्रमुख राजेंद्र सिंह और सह प्रांत प्रचारक मुनीश सहित 21 जिलों के जिला समरसता प्रमुख और विभाग समरसता प्रमुख उपस्थित थे।








