
- कनाडा में चुनाव की नई राह- प्रधानमंत्री मार्क कार्नी का ऐतिहासिक कदम
- टैरिफ वॉर में उलझे कनाडा में क्यों हो रहे हैं समय से पहले चुनाव?
- कनाडा के आगामी चुनाव में प्रमुख पार्टियों की जंग- लिबरल और कंजर्वेटिव
टोरंटो। कनाडा में 28 अप्रैल को आम चुनाव के लिए वोटिंग शुरू हो गई है, जो देश के राजनीतिक भविष्य को प्रभावित कर सकती है। यह चुनाव उस वक्त हो रहे हैं जब कनाडा अपने प्रमुख पड़ोसी, अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर में उलझा हुआ है। चुनाव परिणाम 30 अप्रैल या 1 मई को आने की संभावना है, जो देश के अगले राजनीतिक दृष्टिकोण को आकार देंगे।
समय से पहले चुनाव का ऐलान- मार्क कार्नी की पहल
कनाडा में आम चुनाव अक्टूबर 2025 को होने थे, लेकिन प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने पिछले महीने यह कहकर नए चुनाव का ऐलान किया था कि उन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ मजबूत जनादेश की आवश्यकता है। 2015 से प्रधानमंत्री रहे जस्टिन ट्रूडो ने इस साल के शुरुआत में अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद मार्क कार्नी को देश का नया प्रधानमंत्री चुना गया।
लिबरल और कंजर्वेटिव के बीच कांटे की टक्कर
वर्तमान चुनाव में लिबरल पार्टी और कंजर्वेटिव पार्टी के बीच मुख्य मुकाबला देखा जा रहा है। मेनस्ट्रीट रिसर्च के अनुसार, लिबरल पार्टी को लगभग 189 सीटें मिलने का अनुमान है, और इसके सरकार बनाने की संभावना 70% तक बताई जा रही है। दूसरी ओर, कंजर्वेटिव पार्टी पिछले चुनाव से ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है, हालांकि क्यूबेक और न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (NDP) की सीटों में गिरावट की संभावना जताई जा रही है।
लिबरल पार्टी की स्थापना और मार्क कार्नी की चुनौती
लिबरल पार्टी की स्थापना 1867 में हुई थी, और यह कनाडा की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है, जो प्रगतिशील विचारधारा को बढ़ावा देती है। हालांकि, महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के कारण लिबरल सरकार की आलोचना हो रही है। इस चुनाव में मार्क कार्नी ने लिबरल पार्टी के नेता के रूप में ट्रूडो के स्थान पर पार्टी की कमान संभाली है।
कंजर्वेटिव पार्टी और पियरे पॉलिवर की चुनौती
कंजर्वेटिव पार्टी, जो राइट विंग विचारधारा का समर्थन करती है, वर्तमान लिबरल सरकार की नीतियों, विशेष रूप से कार्बन टैक्स और आर्थिक प्रबंधन की आलोचना कर रही है। पियरे पॉलिवर, जो कंजर्वेटिव पार्टी के नेता हैं, ने इस चुनाव में पार्टी की जीत का दावा किया है। पॉलिवर की रणनीतियों में आर्थिक उदारवाद, सीमित सरकारी हस्तक्षेप और पारंपरिक मूल्यों पर जोर दिया गया है।








