इको गार्डन में बड़ी रैली: पूरे राज्य से लगभग 20 हजार आशा वर्कर्स पहुंचीं

लखनऊ। सोमवार को पूरे उत्तर प्रदेश से करीब 20 हजार आशा वर्कर्स राजधानी लखनऊ पहुंचीं और इको गार्डन में बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन उत्तर प्रदेश आशा वर्कर्स यूनियन के नेतृत्व में और आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन (ACTU) के बैनर तले आयोजित किया गया। आशा वर्कर्स अपनी वेतन वृद्धि, लंबित मानदेय और काम के दौरान होने वाले उत्पीड़न के ख़िलाफ़ पाँच सूत्री मांगों के समर्थन में सड़कों पर उतरी हैं।

प्रमुख माँगे और स्वरूप

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि वे लंबे समय से अपनी 5 सूत्री माँगों को लेकर संघर्ष कर रही हैं, परन्तु सरकार व प्रशासन उनकी अनसुनी कर रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो वे अगले चुनावों में अपनी प्रतिक्रिया ज़रूर देंगी। आशा वर्कर्स का कहना है कि वे ग्राम स्तर पर स्वास्थ्य व संजनक सेवाओं का काम कर रही हैं, पर श्रम मानदेय व सुरक्षा के मामले में अनदेखी झेल रही हैं।

प्रदर्शन में दिखाई देने वाली प्रमुख बातें —

  • वेतन/मानदेय वृद्धि व भुगतान में पारदर्शिता की माँग।

  • लंबित वेतन/प्रोत्साहन तुरंत जारी करने की माँग।

  • कार्यच्छेत्र में मिलने वाले भय-भित्तर शोषण और नौकरी से बेदखली के ख़िलाफ़ सुरक्षा की माँग।

  • ऑनलाइन रिपोर्टिंग व टार्गेटिंग के दबाव खत्म करने और सहज पारदर्शी प्रक्रियाएँ लागू करने की माँग।

  • सामाजिक सुरक्षा, बीमा व स्वास्थ्य सुविधाओं का पूरा प्रावधान सुनिश्चित करने की माँग।

वाराणसी व अयोध्या की प्रतिनिधियों की नाराज़गी

वाराणसी के घोसी ब्लॉक से आई निर्मला देवी ने कहा कि कुछ आशा वर्कर्स को यह कहकर निकाला जा रहा है कि “डिलीवरी नहीं करवा रही हो” — जबकि परिस्थितियाँ नियंत्रित न होने पर ही डिलीवरी करवाई जाती है। निर्मला ने कहा, “जब काम होगा तभी हम डिलीवरी कराएंगे। लेकिन वेतन रोक दिया गया है और हम पर दबाव बन रहा है। हम परेशान हैं।”

अयोध्या से आई आरती सिंह ने कहा, “नारी सशक्तिकरण का भाषण बहुत होता है, पर असलियत इससे उलट है। चार महीने से वेतन रुका है — करवा चौथ और दिवाली जैसे त्यौहार कैसे मनाएँ? अधिकारियों का व्यवहार टॉर्चर जैसा है।”

जीवन-यापन और हड़ताल की धमकी

प्रदर्शन में शामिल कई आशा वर्कर्स ने अपनी व्यक्तिगत आर्थिक परेशानियों का ज़िक्र किया — कई वर्कर्स कर्ज में डूबी हुई हैं, बच्चों की किताबों और घर खर्च के लिए पैसे जुटाने में मुश्किलें आ रही हैं। रंजना नामक एक वर्कर ने कहा कि उन्हें केवल 3,000–4,000 रुपये प्रोत्साहन राशि मिलती है, और वास्तविक जीवनयापन उससे बहुत कठिन हो गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर सरकार ने उनकी सुनवाई नहीं की तो वे 2027 के चुनावों में इस सरकार को सत्ता देने से रोकेंगी

प्रदर्शनकारियों ने यह भी कहा कि वे वोटिंग व्यवहार बदलने के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर लोगों को जोड़ने का काम कर रही हैं और अब इसी ताकत से सिस्टम में परिवर्तन लाने का इरादा जताया गया।

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