
वाराणसी। काशी में चल रही मोरारी बापू की नौ दिवसीय रामकथा रविवार को संपन्न हो गई। इस मौके पर योगगुरु बाबा रामदेव भी कथा स्थल रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर पहुंचे। उन्होंने मोरारी बापू के चरणों में बैठकर आशीर्वाद लिया और मंच से उन्हें ‘राष्ट्र संस्कृति का धरोहर’ बताया। रामदेव ने कहा कि वह यहां किसी आलोचना का जवाब देने नहीं आए हैं और न ही उनके पास इतना समय है।
बाबा रामदेव ने कहा, “बापू की आलोचना कोई विधर्मी मुसलमान, ईसाई या कम्युनिस्ट करें तो समझ में आता है। लेकिन, जिन्हें हम सनातनी कहते हैं, वो लोग आपस में ‘तनातनी’ क्यों कर रहे हैं? यह सनातन संस्कृति है, न कि तनातनी संस्कृति।”
बापू बोले- योग जरूरी है, पर प्रेम सबसे बड़ा
कथा के समापन पर मोरारी बापू ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा कि योग जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन परमात्मा के प्रति प्रेम और परस्पर प्रेम उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, “अगर प्रेम नहीं है तो योग-वियोग, ज्ञान-अज्ञान कुछ भी मायने नहीं रखता। हमारा सनातन धर्म इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि वह सभी को अपनाता है और सबका सम्मान करता है।”
‘मेरे बुद्ध पुरुष ने मेरी मांग भरी है’
सिंदूर के आध्यात्मिक अर्थ पर बोलते हुए मोरारी बापू ने कहा, “अगर कोई बुद्ध पुरुष हमें स्वीकार करता है, तो वह सिंदूर जैसा है। मेरे जीवन में वह सिंदूर मेरे बुद्ध पुरुष ने भरा है। इसलिए मैं हर दिन नित्य प्रसन्न रहता हूं।”
रामदेव ने बापू को बताया ‘महापुरुष’
बाबा रामदेव ने मंच से मोरारी बापू को “महापुरुष” की संज्ञा देते हुए कहा कि बापू का जीवन ही राम की महिमा को गाने के लिए है। उन्होंने कहा, “बापू के दो बेटे हैं – एक पार्थिक और एक पारमार्थिक। हम सब उनकी आत्मिक संतान हैं।”
शंकराचार्य ने जताया था विरोध
गौरतलब है कि मोरारी बापू की पत्नी का निधन 12 जून को हुआ था और इसके दो दिन बाद वे काशी पहुंचे थे। यहां बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद उन्होंने कथा प्रारंभ की थी, जिसे लेकर विरोध शुरू हो गया था। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने एक वीडियो बयान में मोरारी बापू की आलोचना करते हुए उनकी कथा को “रावण जैसी प्रवृत्ति” बताया था।
बापू ने मांगी माफी, कहा- अगली बार कहेंगे ‘काशी कबीर मानस’
कथा के अंतिम दिन बापू ने एक बार फिर अपने वक्तव्यों के लिए क्षमा याचना की और कहा कि अगली बार वे “काशी कबीर मानस” कहने के लिए लौटेंगे। उन्होंने कहा, “नौ दिन की कथा में लगा कि सब कह दिया, लेकिन आज व्यास पीठ छोड़ते समय लगता है कि सब कुछ अधूरा रह गया।”








