
- स्थिति बिगड़ने पर 5 थानों की पुलिस, CRPF और SSB की तैनाती
- चार महीने से जारी विरोध के बावजूद सरकार की चुप्पी से नाराज़ कर्मचारी
- शहरी और ग्रामीण बिजली सप्लाई में भेदभाव का लगाया आरोपल
लखनऊ। निजीकरण के विरोध में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ मंगलवार को बिजली कर्मचारियों के जोश और नारों से गूंज उठा। शक्ति भवन के सामने हजारों कर्मचारी सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शन में उत्तर प्रदेश सहित 10 राज्यों के लगभग 5000 से अधिक बिजलीकर्मी शामिल हुए। प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समर्थन में और ऊर्जा मंत्री ए.के. शर्मा तथा UPPCL चेयरमैन आशीष गोयल के खिलाफ नारे लगाए।
“आशीष गोयल कुर्सी छोड़ो” जैसे नारों के बीच प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और भेदभाव के आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार बार-बार चेतावनी के बावजूद निजीकरण की प्रक्रिया वापस नहीं ले रही है। चार महीने से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद कोई समाधान न निकलने पर उन्होंने सड़कों पर उतरने का फैसला लिया।
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पांच थानों की पुलिस, CRPF और SSB जवानों की मदद ली गई। आंदोलन की अगुवाई कर रहे विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने आरोप लगाया कि शहरी और ग्रामीण इलाकों में बिजली सप्लाई को लेकर गहरी असमानता है।
उन्होंने दावा किया कि निजीकरण से राज्य सरकार को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। आगरा में टोरेंट कंपनी को औने-पौने दामों पर बिजली दी जा रही है, जबकि उपभोक्ताओं से भारी कीमत वसूली जा रही है। इस अंतर के कारण राज्य को हर साल करीब 1000 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ रहा है।
नेशनल कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रिसिटी इम्प्लॉइज एंड इंजीनियर्स की हालिया बैठक में भी तय किया गया था कि यदि सरकार ने कदम नहीं उठाया, तो राष्ट्रव्यापी आंदोलन छेड़ा जाएगा। मंगलवार का प्रदर्शन इसी रणनीति का हिस्सा था।
जम्मू-कश्मीर, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, लद्दाख और चंडीगढ़ से भी कर्मचारी प्रतिनिधि इस प्रदर्शन में शामिल हुए। आंदोलनकारी अब आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं और चेतावनी दे चुके हैं कि यदि सरकार ने निजीकरण की प्रक्रिया को नहीं रोका, तो बड़ा जनांदोलन शुरू किया जाएगा।








