- ट्रिब्यूनल को बेटे-बहू को मकान से निकालने का अधिकार
- कोर्ट ने कहा- बढ़ती उम्र असुरक्षा और अपमान का कारण नहीं
- लखनऊ के विकास नगर से जुड़ा था मामला
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बुजुर्गों के अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि वरिष्ठ नागरिक अपने बच्चों को संपत्ति से बेदखल कर सकते हैं। बढ़ती उम्र का मतलब असुरक्षा, उपेक्षा या अपमान नहीं होना चाहिए। हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने का अधिकार है।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि कानून का उद्देश्य बुजुर्गों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना है। सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार करता है।
हाईकोर्ट का फैसला किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ट्रिब्यूनल के पास परिस्थितियों के अनुसार बच्चों को संपत्ति से बाहर करने का आदेश देने का अधिकार है।
लखनऊ के मकान से जुड़ा था विवाद
मामला लखनऊ के विकास नगर निवासी रवि कांत गुप्ता की अपील से जुड़ा था। उन्होंने 5 जून 2022 को अपने बेटे को मकान से बाहर करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन दिया था। यह मकान उनकी स्वयं खरीदी हुई संपत्ति थी।
मामला उस समय गंभीर हुआ, जब गुप्ता की 81 वर्षीय मां को घर छोड़कर वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर होना पड़ा।
SDM और DM ने दिया था बेदखली का आदेश
SDM ने 15 नवंबर 2022 को बेटे की बेदखली का आदेश दिया था। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने 9 अगस्त 2023 को इस आदेश को बरकरार रखते हुए बेटे और बहू को मकान खाली करने का निर्देश दिया।
बेटे और बहू ने दोनों आदेशों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने आदेश कर दिया था रद्द
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा था कि 2007 का कानून बुजुर्गों को अपनी संपत्ति से बच्चों को बेदखल करने का अधिकार नहीं देता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने SDM और जिला मजिस्ट्रेट के आदेश रद्द कर दिए थे।
अब सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को पलटते हुए बुजुर्गों की गरिमा और सुरक्षा को प्राथमिकता दी है।









