ईरानी हमलों से बदली अमेरिकी रणनीति

ब्रिटेन से 12 B-1 बमवर्षक वापस बुलाए

नई दिल्ली। ईरान पर सैन्य दबाव बनाने के बाद अब अमेरिका को ही अपनी सैन्य रणनीति में बदलाव करना पड़ रहा है। ईरानी हमलों के बाद मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा को लेकर नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इसी कड़ी में ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस से अमेरिका ने अपने 12 B-1 बमवर्षक विमानों को अचानक वापस बुला लिया है।

अमेरिका ने इस कदम को सुरक्षा से जुड़ा सामान्य फैसला बताया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इसे लेकर ज्यादा चिंता जाहिर नहीं की। हालांकि, पिछले कुछ महीनों में ईरान की ओर से अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमलों के बाद अमेरिका की रणनीति में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है।

B-1 बमवर्षक क्यों हटाए गए

ब्रिटेन के RAF फेयरफोर्ड एयरबेस पर अमेरिका के 12 B-1 बमवर्षक विमान तैनात थे। ये विमान लंबी दूरी तक उड़ान भरने और दूर से सैन्य कार्रवाई करने में सक्षम माने जाते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सैन्य कमांडरों को ऐसी जानकारी मिली थी कि ईरान समर्थित समूह एयरबेस की सुरक्षा सीमा के बाहर से ड्रोन हमला करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके बाद इन विमानों को ब्रिटेन से वापस अमेरिका भेजने का फैसला किया गया।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि फेयरफोर्ड एयरबेस अमेरिका और ब्रिटेन के बीच लंबे समय से सैन्य सहयोग का अहम केंद्र रहा है।

1944 से सैन्य गतिविधियों का केंद्र रहा फेयरफोर्ड

RAF फेयरफोर्ड एयरबेस का इतिहास काफी पुराना है। इसे द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान 1944 में तैयार किया गया था। बाद के वर्षों में यह अमेरिकी वायुसेना के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण एयरबेस बना रहा।

यहां से लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों की तैनाती और सैन्य अभियानों से जुड़ी गतिविधियां होती रही हैं। ऐसे में यहां से 12 B-1 विमानों को एक साथ वापस बुलाना अमेरिकी सैन्य तैनाती में बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

मिडिल ईस्ट के ठिकाने भी बने निशाना

ब्रिटेन का फेयरफोर्ड एयरबेस अकेला मामला नहीं है। ईरान ने मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को ड्रोन और मिसाइल हमलों से निशाना बनाया है। इन हमलों के बाद अमेरिका को बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में तैनात अपने सैनिकों और सैन्य संसाधनों की सुरक्षा पर दोबारा विचार करना पड़ा है।

इनमें से कई ठिकाने ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता की पहुंच में आते हैं। ऐसे में अमेरिका के सामने एक तरफ सैन्य दबाव बनाए रखने और दूसरी तरफ अपने सैनिकों तथा महत्वपूर्ण हथियार प्रणालियों को सुरक्षित रखने की चुनौती है।

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