अंबेडकरनगर। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच भारतीय जनता पार्टी के सामने अंबेडकरनगर में सबसे बड़ी चुनौती संगठन को मजबूत करने के साथ स्थानीय सियासी समीकरणों को साधने की है। जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर मजबूत वापसी के लिए पार्टी लगातार संगठन में बदलाव और नए सामाजिक समीकरणों पर काम कर रही है। हाल ही में दिलीप पटेल देव को जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद एक बार फिर पार्टी की रणनीति को लेकर चर्चा तेज है।
अंबेडकरनगर की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने केवल संगठन खड़ा करने की चुनौती नहीं, बल्कि हर विधानसभा क्षेत्र के अलग-अलग सामाजिक समीकरणों के अनुरूप प्रभावी नेतृत्व तैयार करने की भी जरूरत है।
राम मंदिर आंदोलन के दौर में मिली थी पहली बड़ी सफलता
अंबेडकरनगर के गठन से पहले यह क्षेत्र अयोध्या जिले का हिस्सा था। राम मंदिर आंदोलन के दौर में जहांगीरगंज और कटेहरी विधानसभा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज कर अपनी मौजूदगी मजबूत की थी। त्रिवेणी राम और अनिल तिवारी की जीत के बाद पार्टी ने जिले की राजनीति में अपनी जगह बनाई।
29 सितंबर 1995 को अंबेडकरनगर जिला अस्तित्व में आया। इसके बाद भाजपा को लगातार ऐसे चुनावी नतीजों का इंतजार रहा, जो जिले में उसके स्थायी आधार का संकेत दे सकें।
2017 में दो सीटों की जीत से जगी थी उम्मीद
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर के बीच हरिओम पांडे ने अंबेडकरनगर लोकसभा सीट पर भाजपा को जीत दिलाई। इसके बाद वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने वापसी की। आलापुर से अनीता कमल और टांडा से संजू देवी गुप्ता ने जीत दर्ज कर भाजपा के खाते में दो सीटें पहुंचाईं।









