प्राथमिक स्कूलों के विलय पर हाईकोर्ट में दूसरे दिन भी सुनवाई

  • याचिकाकर्ताओं ने RTE का उल्लंघन बताते हुए जताई आपत्ति
  • बच्चों को दूर स्कूल भेजे जाने से असुविधा और खतरे की आशंका
  • मामले की अगली सुनवाई बृहस्पतिवार को होगी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक स्कूलों के विलय को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में बुधवार को दूसरे दिन भी सुनवाई जारी रही। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ के समक्ष सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता ने बहस करते हुए स्पष्ट किया कि यह विलय सभी नियमों और नीतियों के अनुरूप है।

सरकार ने कोर्ट को बताया कि जिन स्कूल भवनों को विलय के बाद खाली किया गया है, उनका उपयोग बाल वाटिका और आंगनबाड़ी केंद्रों के रूप में किया जाएगा। अदालत ने सरकार को अतिरिक्त दस्तावेज और तथ्य पेश करने की अनुमति दी है। अब इस मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी।

डबल बेंच में तीन विशेष अपीलों पर सुनवाई

मामले में दाखिल की गई तीन विशेष अपीलों की सुनवाई मंगलवार को शुरू हुई थी। अपीलकर्ताओं में 17 बच्चों के अभिभावकों और 5 बच्चों की ओर से याचिकाएं दायर की गई थीं। इन अपीलों में हाईकोर्ट की एकल पीठ द्वारा 7 जुलाई को दिए गए फैसले को चुनौती दी गई है, जिसमें प्राथमिक स्कूलों के विलय को वैध ठहराते हुए याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।

पहले खारिज हो चुकी है याचिकाएं

7 जुलाई को न्यायमूर्ति पंकज भाटिया की एकल पीठ ने सरकार के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसमें सीतापुर के 51 बच्चों सहित अन्य याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था। इसके बाद 10 जुलाई को दाखिल एक जनहित याचिका भी खंडपीठ ने खारिज कर दी थी। अब अभिभावकों ने डबल बेंच में विशेष अपील दाखिल कर आपत्ति दर्ज कराई है।

अपीलकर्ताओं की दलील – RTE का उल्लंघन

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि स्कूलों के विलय से छोटे बच्चों को दूर स्कूल जाना पड़ेगा, जिससे उनकी पढ़ाई और सुरक्षा दोनों प्रभावित होंगी। यह बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार कानून (RTE Act) का उल्लंघन है।

16 जून को जारी हुआ था आदेश

बेसिक शिक्षा विभाग ने 16 जून 2025 को आदेश जारी कर हजारों प्राथमिक स्कूलों को उच्च प्राथमिक या कंपोजिट स्कूलों में विलय करने का निर्देश दिया था। सरकार का तर्क है कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार और संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा। लेकिन कुछ छात्रों और अभिभावकों ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी है।

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