सऊदी अरब अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर दशकों से अरबों डॉलर खर्च करता आया है। उसके पास आधुनिक लड़ाकू विमान, मिसाइलें और हवाई हमलों को रोकने वाले अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम हैं। सैन्य खर्च के मामले में भी वह दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल है। इसके बावजूद हूती विद्रोहियों के सस्ते ड्रोन और क्रूज मिसाइलें उसकी सुरक्षा व्यवस्था के सामने चुनौती पेश कर रही हैं।
इस चुनौती की सबसे बड़ी वजह हथियारों की कीमत में भारी अंतर है। एक ड्रोन की कीमत करीब 15 लाख रुपये बताई जाती है, जबकि उसे नष्ट करने के लिए इस्तेमाल होने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत करोड़ों रुपये तक पहुंच सकती है। ऐसे में हमले को नाकाम करने की लागत, हमले में इस्तेमाल हथियार की कीमत से कई गुना ज्यादा हो सकती है।
कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन बनते हैं चुनौती
हूतियों के ड्रोन और क्रूज मिसाइलें कई बार कम ऊंचाई पर उड़ती हैं और अपना रास्ता भी बदल सकती हैं। इससे रडार के लिए उन्हें दूर से पहचानना मुश्किल हो सकता है। सऊदी अरब का विशाल क्षेत्र भी उसकी वायु सुरक्षा के लिए चुनौती है, क्योंकि हर अहम ठिकाने और सीमा की एक साथ सुरक्षा करना आसान नहीं है।
सऊदी अरब की वायु रक्षा में अमेरिकी पैट्रियट सिस्टम अहम भूमिका निभाता है। इसकी इंटरसेप्टर मिसाइल की कीमत मॉडल और खरीद समझौते के अनुसार अलग-अलग होती है। कुछ अनुमानों में इसकी कीमत 30 लाख डॉलर या उससे अधिक बताई गई है, जो भारतीय मुद्रा में करीब 25 करोड़ रुपये से ज्यादा बैठती है। इसके मुकाबले कम कीमत वाले ड्रोन को रोकने में खर्च का अंतर बहुत बड़ा हो सकता है। हालांकि, हर ड्रोन को रोकने के लिए पैट्रियट मिसाइल का इस्तेमाल जरूरी नहीं होता। खतरे के प्रकार, लक्ष्य और उपलब्ध रक्षा प्रणाली के आधार पर अलग-अलग उपाय अपनाए जा सकते हैं। इसलिए केवल हथियारों की कीमत की तुलना से पूरी सैन्य रणनीति का आकलन नहीं किया जा सकता।
सस्ते हथियारों से बार-बार हमले होने पर महंगी इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार तेजी से घट सकता है। दुनिया के कई क्षेत्रों में जारी संघर्षों के कारण इन मिसाइलों की आपूर्ति पर भी दबाव है। ऐसे में सऊदी अरब के सामने दोहरी चुनौती है—अपने अहम ठिकानों की रक्षा करना और सीमित रक्षा संसाधनों का प्रभावी इस्तेमाल करना।









