
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला, समय सीमा क्यों बनी विवाद का केंद्र
- राष्ट्रपति और राज्यपाल के अधिकारों पर नया विवाद
- क्या सुप्रीम कोर्ट का आदेश सरकार और अदालत के बीच टकराव बढ़ाएगा
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा तय करने के फैसले के बाद कानूनी और राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ गई है। पूर्व कानून मंत्री अश्विनी कुमार ने चेतावनी दी है कि इससे सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है, जिसका समाधान जरूरी है।
विशेषज्ञों की राय
संवैधानिक विशेषज्ञ एडवोकेट सुमित गहलोत ने कहा कि गृह मंत्रालय ने 2016 में ही राज्यपालों को तीन महीने के भीतर बिल पर फैसला देने का निर्देश दिया था। उन्होंने कहा, “सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कोई नई बात नहीं है। आर्टिकल 74 के तहत राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही काम करना होता है, इसलिए उनकी स्वतंत्र भूमिका सीमित है।”
वहीं, सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि यह मामला सिर्फ समय-सीमा का नहीं, बल्कि संघीय ढांचे और नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा है। “सवाल यह है कि क्या कोई राज्यपाल या राष्ट्रपति बिल को अनिश्चितकाल तक रोक सकता है? ऐसा करके सरकार के कामकाज में बाधा डाली जा सकती है और जनता को उसके विधायी अधिकारों से वंचित किया जा सकता है।”
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
बिल पर फैसला अनिवार्य: कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति को बिल मिलने के 3 महीने के भीतर मंजूरी देनी होगी या अस्वीकृति का कारण बताना होगा।
न्यायिक समीक्षा का अधिकार: अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति के निर्णय की न्यायिक समीक्षा हो सकती है, खासकर अगर फैसला मनमाना या दुर्भावनापूर्ण हो।
राज्यपाल बार-बार बिल नहीं लौटा सकते: अगर विधानसभा दोबारा बिल पास कर दे, तो राष्ट्रपति को उसे मंजूरी देनी होगी।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
17 अप्रैल: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि “अदालतें राष्ट्रपति को आदेश नहीं दे सकतीं। अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ ‘न्यूक्लियर मिसाइल’ बन गया है।”
18 अप्रैल: राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने जवाब दिया कि “भारत में राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया है। जब कार्यपालिका काम नहीं करेगी, तो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करना पड़ेगा।”
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और सीमाओं पर नई बहस छेड़ दी है। जहां एक ओर इसे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता का कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसे न्यायपालिका की अतिक्रमण की कोशिश भी कहा जा रहा है। अब नजर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी पीठ पर है, जो इस मुद्दे पर अंतिम मुहर लगाएगी।








