लखनऊ में मुहर्रम की रौनक, मोम, चांदी और लकड़ी के ताजियों की धूम

  • लखनऊ में मुहर्रम की शुरुआत, ताजिए और जुलूसों का दौर शुरू
  • शाही ज़री में इस बार बड़ा इमामबाड़ा की झलक
  • बहराइच के कारीगरों ने तैयार की 2.5 कुंतल मोम की ज़री

लखनऊ। राजधानी लखनऊ में शुक्रवार से इस्लामी नववर्ष माह-ए-मुहर्रम की शुरुआत हो गई। शिया समुदाय के लिए बेहद अहम इस महीने में इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए ताजिया और जुलूसों की परंपरा निभाई जाती है। शहर की फिजा “या हुसैन” की सदाओं से गूंजने लगी है और इमामबाड़ों के साथ घरों में भी ताजिया स्थापित किए जा रहे हैं।

मोहर्रम की पहली तारीख को लखनऊ की खास शाही ज़री का जुलूस बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक निकाला जाएगा। ऊंट, घोड़े और हाथियों के साथ बड़ी संख्या में लोग पैदल इस जुलूस में शामिल होते हैं।

3 महीने पहले शुरू होती है शाही ज़री की तैयारी

शाही ज़री को इस बार बहराइच के कारीगर नसीम अली और उनके परिवार ने तैयार किया है। परिवार के 12 सदस्य मिलकर इस पर काम करते हैं। इस बार की ज़री 22 फीट ऊंची और 10 फीट चौड़ी होगी, जिसे 2.5 कुंतल मोम, बांस, कागज और अन्य सामग्री से बनाया गया है।

नसीम अली ने बताया कि उन्हें इसके लिए ₹2.65 लाख मिलते हैं, जो लागत के बराबर है। उन्होंने नाराजगी जताते हुए कहा कि वर्षों से मेहनताना नहीं बढ़ा, जबकि मोम की कीमत ₹160 से बढ़कर ₹200 प्रति किलो हो गई है।

हिंदू कारीगरों की भी अहम भूमिका

लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल इस बात से भी मिलती है कि मोहर्रम की तैयारियों में हिंदू कारीगर भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। सर्राफा बाजार के विनोद माहेश्वरी ने चांदी से बने ताजिए, पंजे, अलम और मश्क तैयार किए हैं। ये कारीगरी ग्राहकों को खासा आकर्षित कर रही है।

घंटाघर के सामने जफर अली ने लकड़ी के ताजिए तैयार किए हैं। उनका परिवार यह काम तीन पीढ़ियों से करता आ रहा है। लकड़ी के नक्काशीदार ताजियों की कीमत ₹1,000 से लेकर ₹1.5 लाख तक होती है। इनकी डिमांड यूरोप तक है और तैयारी 5 महीने पहले शुरू हो जाती है।

कागज के ताजिए की सबसे अधिक मांग

कारीगर अकबर अली बताते हैं कि आम लोगों में कागज से बने ताजिए की मांग सबसे अधिक होती है। ये हल्के होते हैं और बड़े आकार में तैयार किए जाते हैं, जिससे इन्हें जुलूस में ले जाना आसान होता है।

ताजिया परंपरा की 350 साल पुरानी विरासत

लखनऊ में ताजिया रखने की परंपरा 1675 में शुरू हुई थी। नवाब शुजा-उद-दौला की पत्नी उन्मतुज्जोहरा बानो उर्फ बहू बेगम ने जब कर्बला की यात्रा नहीं कर पाईं, तो उन्होंने घर पर ताजिया रखकर इमाम हुसैन को याद किया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

नवाब मसूद अब्दुल्लाह ने बताया कि ताजिया दरअसल हजरत इमाम हुसैन के मजार का प्रतीक होता है। जो लोग कर्बला नहीं जा पाते, वे ताजिया के ज़रिए इमाम की याद में शोक मनाते हैं।

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