- 2015-16 में अनुपात 919 था, अब 930 बताया गया
- पहली संतान बेटी होने वाले परिवारों में असर ज्यादा
नई दिल्ली। देश में जन्म के समय लड़कियों का अनुपात सुधारने के प्रयासों के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के शुरुआती जिलों में हुए बदलावों पर आधारित एक शोध में हर 1,000 जन्म पर करीब 15 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान लगाया गया है। इसका प्रभाव खास तौर पर उन परिवारों में अधिक दिखाई दिया, जिनकी पहली संतान बेटी थी। हालांकि, जन्म अनुपात में सुधार के बावजूद लैंगिक अंतर और लड़कियों की शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
जन्म के समय लड़कियों का अनुपात बढ़ा
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 2015-16 में हर 1,000 लड़कों पर 919 लड़कियों का जन्म दर्ज किया जाता था। अब यह अनुपात बढ़कर 930 हो गया है। इसके बावजूद देश के 757 जिलों में से केवल 26 जिलों में जन्म के समय लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि सुधार के बावजूद देश में लैंगिक संतुलन की चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
पहली संतान बेटी होने पर दिखा ज्यादा असर
‘पॉलिसी इंटरवेंशंस एंड द सेक्स रेशियो एट बर्थ: एविडेंस फ्रॉम इंडिया’ रिपोर्ट के अनुसार, दूसरी और उसके बाद की संतानों में लड़की के जन्म की संभावना में 2.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। जिन परिवारों की पहली संतान बेटी थी, वहां दूसरी संतान भी बेटी होने की संभावना 3.7 से 5.3 प्रतिशत अंक तक बढ़ी।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बदलाव का अर्थ ऐसे परिवारों में हर 1,000 जन्म पर 37 से 53 अतिरिक्त लड़कियों के जन्म का अनुमान है। इसके विपरीत, पहली संतान बेटा होने वाले परिवारों में ऐसा बदलाव नहीं मिला। ये निष्कर्ष अभियान के शुरुआती जिलों में हुए बदलावों पर आधारित शोध से जुड़े हैं; इन्हें पूरे देश में समान प्रभाव का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए।
शिक्षा में अब भी पीछे हैं लड़कियां
जन्म अनुपात में सुधार के बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों के सामने चुनौतियां बनी हुई हैं। दी गई जानकारी में यूनेस्को की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि ग्रामीण भारत में 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाले हर 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां यह स्तर पूरा कर पाती हैं।
इससे संकेत मिलता है कि बेटियों के जन्म को लेकर सोच में बदलाव के साथ उनकी शिक्षा जारी रखने, स्कूलों तक पहुंच और पढ़ाई पूरी करने के अवसरों पर भी ध्यान देना जरूरी है। जन्म के समय लैंगिक अनुपात में सुधार महत्वपूर्ण है, लेकिन वास्तविक समानता के लिए शिक्षा में अंतर कम करना भी उतना ही आवश्यक है।









