नई दिल्ली। रूस और ईरान से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अमेरिका की ओर से लगाए जा सकने वाले नए टैरिफ के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को लेकर स्थिति स्पष्ट की है। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत अचानक रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद नहीं कर सकता और न ही रातोंरात दूसरे देशों के सप्लायर्स पर पूरी तरह शिफ्ट हो सकता है।
सीतारमण ने मंगलवार को ‘बिजनेसलाइन चेंजमेकर अवॉर्ड्स’ कार्यक्रम में कहा कि भारत के सामने 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा जरूरत पूरी करने की जिम्मेदारी है। ऐसे में कच्चे तेल की खरीद को लेकर देश की ऊर्जा सुरक्षा और उपलब्धता को ध्यान में रखना जरूरी है।
ट्रंप के नए कानून से बढ़ी चुनौती
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026’ पर हस्ताक्षर किए हैं। इस कानून के तहत रूस से तेल और गैस खरीदने वाले कुछ बड़े खरीदार देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति को मिला है। हालांकि, कानून अपने आप भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं करता, बल्कि ऐसी कार्रवाई का अधिकार देता है।
भारत उन देशों में शामिल है जो रूसी कच्चे तेल के बड़े खरीदार हैं। ऐसे में अमेरिकी कानून का संभावित असर भारत की ऊर्जा खरीद और व्यापार पर पड़ सकता है।
दूसरे देशों से तेल लेने पर कीमत बढ़ने का खतरा
वित्त मंत्री ने कहा कि यदि भारत अचानक रूसी तेल से बाहर निकलकर दूसरे सप्लायर्स से खरीद शुरू करता है तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध तेल का पूल और सीमित हो सकता है। इससे कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का दबाव बन सकता है।
सीतारमण के मुताबिक, भारत को अपनी जरूरत के मुताबिक अलग-अलग स्रोतों से तेल खरीदना होगा। उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही अपने तेल आयात के स्रोतों में विविधता ला रहा है, लेकिन रूसी आपूर्ति को अचानक पूरी तरह बदलना आसान नहीं होगा।
पश्चिम एशिया संकट से पहले ही सप्लाई पर दबाव
वित्त मंत्री ने पश्चिम एशिया में जारी तनाव और क्षेत्र में ऊर्जा प्रतिष्ठानों को हुए नुकसान का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि ऐसे घटनाक्रमों के कारण वैश्विक बाजार में उपलब्ध कच्चे तेल की मात्रा पर दबाव पड़ा है।
ऐसे समय में दुनिया के बड़े तेल सप्लायर्स में से किसी एक स्रोत से अचानक खरीद बंद करने पर बाजार में आपूर्ति और कीमतों का संतुलन प्रभावित हो सकता है। भारत के लिए यह स्थिति खास तौर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है।









