मोहन भागवत बोले- धर्म रिलिजन नहीं, जीवन का अनुशासन है

उज्जैन की युवा धर्म संसद में बोले संघ प्रमुख- इच्छा, भय, लोभ या प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए

  • उज्जैन में युवा धर्म संसद को मोहन भागवत ने किया संबोधित
  • कहा- कर्मकांड धर्म का हिस्सा, पूरा धर्म नहीं
  • इच्छा, भय और लालच में धर्म न छोड़ने की बात

उज्जैन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि धर्म रिलिजन नहीं, बल्कि जीवन का अनुशासन है। किसी इच्छा की पूर्ति, भय, लोभ या अपने प्राण बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। उनके अनुसार सुख और दुख आते-जाते रहते हैं, लेकिन धर्म नित्य रहता है।

कर्मकांड धर्म का हिस्सा, पूरा धर्म नहीं

मोहन भागवत ने कहा कि धर्म को लेकर भ्रम का एक कारण अपनी भाषा और धर्म के वास्तविक अर्थ को भूल जाना है। उनके मुताबिक पश्चिमी देशों के लोगों ने भारत में धर्म के आचरण, कर्मकांड और अनुशासन को देखा और उसे अपने यहां के ‘रिलिजन’ के समान समझ लिया। बाद में भारत में भी धर्म के लिए ‘रिलिजन’ शब्द का इस्तेमाल होने लगा।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह कुश्ती सीखने के लिए अखाड़े में दंड-बैठक लगाना अभ्यास का हिस्सा है, उसी तरह धर्म से जुड़े कर्मकांड और अनुशासन भी उसके अभ्यास का हिस्सा हैं। हालांकि कर्मकांड धर्म का एक अंग है, पूरा धर्म नहीं।

इच्छा, भय और लालच में धर्म न छोड़ें

संघ प्रमुख ने कहा कि व्यक्ति जीवन में भौतिक सुख, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूर्ति चाहता है, लेकिन उनके अनुसार धर्म का पालन व्यक्ति को सही दिशा देता है। उन्होंने कहा कि किसी इच्छा को पूरा करने, डर या लालच के कारण अथवा अपनी जान बचाने के लिए भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। भागवत ने कहा कि धर्म व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाता है।

‘धर्म बुढ़ापे की चीज नहीं’

भागवत ने युवा धर्म संसद में युवाओं के धर्म पर विचार करने को लेकर खुशी जताई। उन्होंने कहा कि आजकल धर्म को लेकर ऐसी चर्चा कम सुनने को मिलती है। उन्होंने उस धारणा का उल्लेख किया कि गीता और रामायण जैसे ग्रंथों को रिटायरमेंट के बाद पढ़ने की चीज माना जाता है, जबकि ऐसा नहीं है।

उन्होंने कहा कि धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से लेकर अंत तक रहता है और जीवन उसी के अनुसार चलता है। इसे मानना या न मानना व्यक्ति पर निर्भर है, लेकिन उनके अनुसार धर्म की अवधारणा जीवन से जुड़ी हुई है।

अहंकार से पैदा होती है गलतफहमी

संघ प्रमुख ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अहंकार में आकर यह मानकर काम करता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और हर चीज उसकी इच्छा के अनुसार होनी चाहिए, तो उसे गलतफहमी हो जाती है। उन्होंने युवाओं से धर्म की अवधारणा को समझने और उस पर विचार करने की बात कही।

1700 छात्र-छात्राएं ले रहे हिस्सा

उज्जैन के गीता भवन में तीन दिवसीय युवा धर्म संसद की शुरुआत 17 सितंबर को हुई थी। शुक्रवार को दूसरे दिन धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा पर व्याख्यान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सूचना-विचार संघर्ष पर संवाद समेत विभिन्न सत्र आयोजित किए जा रहे हैं। देशभर से चयनित युवाओं का विशेष उद्बोधन सत्र भी कार्यक्रम का हिस्सा है।

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कार्यक्रम में अवधेशानंद गिरि महाराज, लेखक एवं गीतकार मनोज मुंतशिर, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के प्रो. श्रीनिवास बरखेड़ी समेत करीब 300 विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्य हिस्सा ले रहे हैं। देशभर से करीब 1700 छात्र-छात्राएं भी कार्यक्रम में पहुंचे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 19 सितंबर को होने वाले समापन सत्र में शामिल होंगे।

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