दो महीने में ही घिरने लगी नेपाल की बालेन सरकार

वादों में देरी और मंत्रियों के इस्तीफे से बढ़ी नाराजगी

  • 100 पॉइंट एजेंडा में 88 वादे तय समय से पीछे
  • दो मंत्रियों के इस्तीफे से सरकार की छवि पर असर
  • जेन-जी युवाओं में बढ़ा असंतोष, पार्टी के भीतर भी उठे सवाल

नेपाल में प्रधानमंत्री Balen Shah की सरकार को सत्ता संभाले अभी सिर्फ दो महीने हुए हैं, लेकिन सरकार की कार्यशैली को लेकर सवाल उठने लगे हैं। 27 मार्च को शपथ लेने के बाद बालेन शाह ने 100 पॉइंट सुधार एजेंडा लॉन्च किया था, लेकिन प्रधानमंत्री कार्यालय की ट्रैकर वेबसाइट के मुताबिक इनमें से 88 वादे तय समय सीमा से पीछे चल रहे हैं।

दो बड़े मंत्रियों को छोड़ना पड़ा पद

सरकार बनने के शुरुआती 30 दिनों के भीतर ही बालेन सरकार के दो प्रमुख मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। श्रम मंत्री दीपक शाह पर अपनी पत्नी को गलत तरीके से नौकरी दिलाने का आरोप लगा, जिसके बाद उन्हें पद छोड़ना पड़ा।

वहीं गृह मंत्री सूदन गुरुंग पर जांच के दायरे में आए एक कारोबारी से करीबी संबंध होने के आरोप लगे। विवाद बढ़ने के बाद उन्होंने भी इस्तीफा दे दिया।

इन घटनाओं के बाद खासतौर पर जेन-जी युवाओं में नाराजगी बढ़ती दिख रही है। युवाओं का कहना है कि नई राजनीति और पुराने सिस्टम में फर्क आखिर कहां है।

पार्टी के भीतर भी उठने लगे सवाल

बालेन सरकार के कई फैसलों के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन हुए हैं और कई मामलों को अदालत में चुनौती भी दी गई है। विपक्ष के साथ-साथ अब उनकी अपनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता भी सवाल उठा रहे हैं।

पार्टी नेताओं आशिका तमांग और अमरेश कुमार सिंह ने संसद में विपक्ष के सवालों का जवाब नहीं दिए जाने पर सार्वजनिक तौर पर नाराजगी जताई। अमरेश सिंह ने यहां तक कहा कि नेपाल का लोकतंत्र “पाकिस्तान मॉडल” की तरफ बढ़ता दिख रहा है, जहां सरकार संसद के प्रति जवाबदेह नहीं रहती।

क्यों पूरे नहीं हो पाए बड़े वादे

प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह ने मंत्रालयों की संख्या कम करने, घाटे वाले बोर्ड और समितियों को मर्ज करने तथा सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों को राजनीति से दूर रखने जैसे बड़े वादे किए थे।

इसके अलावा सरकार ने गौरी बहादुर कार्की आयोग की सिफारिशें लागू करने, बंद पड़ी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने, निवेश और उद्योग सेवाओं को डिजिटल बनाने और ऊर्जा निर्यात की लंबी रणनीति तैयार करने का भी ऐलान किया था।

हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सरकार ने कई योजनाओं के लिए 24 घंटे, 7 दिन और 15 दिन जैसी बेहद छोटी समय सीमाएं तय कर दीं, जिन्हें पूरा करना व्यवहारिक रूप से मुश्किल था।

कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर विवाद

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासनिक सुधारों और नए आयोगों के गठन के लिए कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना जरूरी होता है, लेकिन सरकार ने जल्दबाजी में कई फैसले लेने की कोशिश की। यही वजह रही कि शुरुआती दौर में ही सरकार अपने कई अहम वादे पूरे नहीं कर सकी।

गिरफ्तारी और आयोग रिपोर्ट पर भी विवाद

बालेन सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के अंतरिम कार्यकाल में बने कार्की आयोग की रिपोर्ट लागू करने का फैसला किया था। इस रिपोर्ट में भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की जांच से जुड़े कई सुझाव दिए गए थे। हालांकि विपक्ष ने आरोप लगाया कि इसे बिना स्पष्ट कानूनी आधार के लागू किया गया।

इसी दौरान पूर्व प्रधानमंत्री K. P. Sharma Oli और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक की गिरफ्तारी को लेकर भी विवाद पैदा हो गया। आरोप लगा कि गिरफ्तारी से पहले जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया।

वहीं नेपाली कांग्रेस नेता दीपक खड़का को लंबे समय तक हिरासत में रखने के बाद सबूतों की कमी के चलते रिहा करना पड़ा।

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