वंदे मातरम के सभी छह छंद अनिवार्य करने पर शशि थरूर ने उठाए सवाल

बोले- लोगों के लिए हो सकता है बोझिल

  • कांग्रेस सांसद ने सरकारी कार्यक्रमों में पूरे वंदे मातरम के अनिवार्य गायन पर जताई आपत्ति
  • कहा- राष्ट्रगीत का पारंपरिक हिस्सा ही लंबे समय से स्वीकार और सम्मानित
  • संसद के किसी कानून में नहीं है इसे अनिवार्य करने का प्रावधान

तिरुवनंतपुरम। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत और समापन पर राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों को बजाने या गाने को अनिवार्य बनाने के प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इसे गैर-जरूरी बताते हुए कहा कि लंबा संस्करण लोगों के लिए असुविधाजनक और बोझिल साबित हो सकता है।

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में सोमवार को मीडिया से बातचीत के दौरान थरूर ने कहा कि वंदे मातरम देश का राष्ट्रगीत है और जब भी इसे गाया जाता है, लोग सम्मान में खड़े होते हैं। हालांकि, इसके पहले एक या दो छंद ही अधिकांश लोगों को याद होते हैं और परंपरागत रूप से सार्वजनिक कार्यक्रमों में इन्हीं का उपयोग किया जाता रहा है।

थरूर ने कहा कि वर्षों से यह व्यवस्था रही है कि कार्यक्रम की शुरुआत में वंदे मातरम गाया जाता है, जबकि समापन पर राष्ट्रगान प्रस्तुत किया जाता है। उन्होंने कहा कि इस परंपरा को बदलने की आवश्यकता नहीं दिखाई देती।

दिल्ली के कार्यक्रम का दिया उदाहरण

कांग्रेस सांसद ने 19 फरवरी को दिल्ली में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन की मौजूदगी में आयोजित एक कार्यक्रम का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां कार्यक्रम की शुरुआत और समापन दोनों अवसरों पर वंदे मातरम का पूरा संस्करण बजाया गया था। उनके अनुसार, गीत की लंबाई अधिक होने के कारण लोगों को दो बार लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ा, जिससे असुविधा महसूस हुई।

थरूर ने स्पष्ट किया कि उन्हें राष्ट्रगीत से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इसका पारंपरिक रूप, जिसकी अवधि लगभग राष्ट्रगान के बराबर है, लंबे समय से स्वीकार किया जाता रहा है और उसे सम्मान भी मिला है।

कानून में अनिवार्यता का प्रावधान नहीं

उन्होंने कहा कि संसद द्वारा पारित ऐसा कोई कानून नहीं है, जो वंदे मातरम के पूरे संस्करण को सरकारी कार्यक्रमों में अनिवार्य रूप से गाने का निर्देश देता हो। उनके मुताबिक, इस विषय पर यदि कोई मतभेद है तो उसका समाधान आपसी सहमति और संवाद से निकाला जा सकता है।

उल्लेखनीय है कि इस मुद्दे पर केरल सरकार का कहना है कि वंदे मातरम का पूरा संस्करण गाना वैकल्पिक है, जबकि राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर की राय इससे अलग मानी जा रही है।

प्रमुख बिंदु

  1. शशि थरूर ने वंदे मातरम के पूरे संस्करण को अनिवार्य करने पर सवाल उठाए।
  2. कहा कि लंबा संस्करण कार्यक्रमों में लोगों के लिए असुविधाजनक हो सकता है।
  3. पारंपरिक रूप से केवल शुरुआती छंद ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में गाए जाते रहे हैं।
  4. संसद के किसी कानून में पूरे वंदे मातरम को अनिवार्य नहीं बताया गया है।
  5. थरूर ने इस मुद्दे का समाधान आपसी सहमति से निकालने की बात कही।

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