- आयुष बोर्ड कार्यालय का घेराव, पुलिस ने रोका
- बोर्ड की कार्यप्रणाली पर उठाए सवाल
- प्रमुख सचिव और रजिस्ट्रार को हटाने की मांग
लखनऊ। उत्तर प्रदेश आयुष बोर्ड की कार्यप्रणाली के विरोध में गुरुवार को राजधानी लखनऊ में माध्यमिक, उच्च, तकनीकी एवं मेडिकल कॉलेज संयुक्त महासभा के बैनर तले जोरदार प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने आयुष बोर्ड कार्यालय का घेराव कर नारेबाजी की और बोर्ड को तत्काल सक्रिय करने की मांग उठाई। इस दौरान कार्यालय में प्रवेश की कोशिश कर रहे प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने मुख्य गेट पर ही रोक दिया, जिससे कुछ देर तक मौके पर तनाव का माहौल बना रहा।
बोर्ड कार्यालय के बाहर नारेबाजी, पुलिस से नोकझोंक
प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में पुलिस बल पहले से ही तैनात था। जब प्रदर्शनकारी बोर्ड कार्यालय के भीतर जाने लगे तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इस दौरान प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हल्की नोकझोंक भी हुई, हालांकि पुलिस ने स्थिति को जल्द ही नियंत्रित कर लिया।
बोर्ड को सक्रिय करने और परीक्षाएं कराने की मांग
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि आयुष बोर्ड लंबे समय से प्रभावी ढंग से काम नहीं कर रहा है, जिससे छात्रों और शिक्षण संस्थानों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने हाईकोर्ट के आदेशों का तत्काल पालन करने, बोर्ड को पूरी तरह क्रियाशील बनाने और लंबित परीक्षाएं जल्द आयोजित कराने की मांग की।
प्रमुख सचिव और रजिस्ट्रार को हटाने की मांग
महासभा के पदाधिकारियों ने प्रदर्शन के दौरान प्रमुख सचिव आयुष और बोर्ड के रजिस्ट्रार को तत्काल पद से हटाने की मांग की। उनका कहना था कि विभाग की कार्यशैली के कारण बोर्ड की व्यवस्था प्रभावित हुई है और हजारों छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। साथ ही बोर्ड के उपाध्यक्ष को तत्काल कार्यभार सौंपने की भी मांग उठाई गई।
छात्रवृत्ति और मुआवजे का मुद्दा भी उठाया
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि बोर्ड की निष्क्रियता के कारण कई छात्र छात्रवृत्ति से वंचित रह गए हैं। ऐसे छात्रों को उचित मुआवजा दिया जाए और उनकी समस्याओं का जल्द समाधान किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
आयुष मंत्री से हस्तक्षेप की मांग
प्रदर्शनकारियों ने आयुष मंत्री से मामले में न्यायसंगत निर्णय लेने की मांग की। उनका कहना था कि यदि विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया गया और छात्रों के हितों की अनदेखी जारी रही, तो मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उचित कदम उठाना चाहिए।









